गुरुवार, 12 जनवरी 2017

गंगा किनारे वाले की डायरी : जादूगर का खेल (भाग -6)


याद हैं, उस शाम हम गंगा बाज़ार के पास लगने वाले मेले के लिए घर से निकले तो चौपाल के पास जादूगर का खेल देखने के लिए रुक गए थे।  

शायद तुम्हे याद होगा की जादूगर ने तुम्हारे हाथ में बंधी घड़ी को गायब करके मेरी जेब से निकाला था, फिर मेरी जेब का रुमाल गायब करके अपने जादू से तुम्हारे दुप्पटे में उलझा दिया था।

जादूगर का खेल देखते देखते कब शाम से रात हो गयी हमें पता भी ना चला| घर में बताने के लिए दोनों ने मेले की खूब सारी झूठी कहानियां रट ली थी।  घर पहुँचने की जल्दी में तुम्हारी घड़ी मेरे पास ही रह गयी थी।  उस घड़ी को मैंने आज तक संभाल कर रखा हैं

मैं कई बरसो बाद उसी जगह से गुजरा, लेकिन अब वहा कोई चौपाल नहीं थी।  वक़्त के जादूगर ने चौपाल की जगह पक्के मकान और गाड़ियों को जमा कर दिया था | मैंने गाँव के लोगो से उस जादूगर के बारे में पूछा था पता चला कि अब वो जादूगर यहाँ नहीं आता।

उस शाम की तरह इस शाम भी मैं वापस घर की तरफ चलने लगा, पर इस शाम ना मेरे हाथो में तुम्हारा हाथ था, ना तुम और ना तुम्हारा वक़्त
काश! वो जादूगर उस रात तुम्हारे हाथ में बंधी घड़ी के साथ तुम्हारा वक़्त भी मुझे दे देता।

आज वो जादूगर मिल जाए तो मैं उससे कहूँ कि वो घड़ी हमारे रिश्ते की तरह रुक गयी हैं उसे वापस तुम तक पहुंच दे।

उस पूरी रात मैं बार-बार अपनी जेबें टटोलता रहा कि शायद कोई जादूगरआज फिर से मेरी जेब में रखे रुमाल जैसे खत तुम्हारे दुप्पटे में उलझा आये।  

        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 7 नवंबर 2016

गंगा किनारे वाले की डायरी : ज़रा ध्यान से समेटना...(भाग -5)


ताजमहल के सामने खिंचवाई हुई ये तस्वीर अकेले नहीं टूटी हैं, इन कांच के टुकड़ो के साथ कुछ पल भी बिखर गए हैं
ज़रा ध्यान से समेटना....

साथ बिताये पल, दूरी वाले पल, रूठने वाले पल, मनाने वाले पल, तकिये की लड़ाई वाले पल, बचकानी शर्तो वाले पल, कमरे की बत्ती बंद करने पर होने वाली मीठी बहस के पल,
सब बिखर गए हैं,
ज़रा ध्यान से समेटना....

एक पल छिटक कर दूर कोने में जा पहुंचा है
ये वो पल हैं जो गंगा किनारे वाले मंदिर की सीढिया चढ़ते हुए थक गया था,
शायद वो कुछ देर सुस्ताना चाहता हैं
सुस्ताने दो, फिर ज़रा ध्यान से समेटना....

वो पल जो फर्श के बीचो बीच धाक जमाये बैठा हैं
वो उस बगावत का पल हैं जो हमने अपने प्यार के लिए घरवालो से की थी
थोड़ा भारी हैं, आओ इस पल को दोनों समेटते हैं,
टूट कर और ना बिखर जाए, जरा ध्यान से समेटना ...

याद हैं मैंने एक बार जामुन का रंग तुम्हारे सफ़ेद कपड़ो पर मल दिया था, और फिर कई दिन तक इस बात पर लड़ाई रही थी, वो पल छिटक कर आँगन में चला गया हैं
देखो आज फिर कही तुम्हारे कपड़ो पर जामुनी रंग ना लग जाए
ज़रा ध्यान से समेटना....

ये पल जो उचट कर गोदी में आ गिरा हैं ये वो पल हैं जो करवाचौथ पर पेट दर्द के बहाने भूखा प्यासा रहा था, इसे कुछ खिला देना
फिर, जरा ध्यान से समेटना ....

तुम्हारे पैरो के पास जो दो पल बिखरे हैं ये वो पल हैं जब मैं तुम्हारे लिए पायल और बिछिया लाया था
इन दो पलो को पहन लो शायद इस बहाने मैं तुम्हारे साथ रह सकू...
उम्मीदों के अखबार पर एहसासों के बाकी पल समेट लो और फेंक आओ किसी ऐसी जगह जहाँ ये पल फिर किसी के दिल में ना चुभे...
पर हाँ, जरा ध्यान से समेटना ....

        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 28 सितंबर 2016

गंगा किनारे वाले की डायरी : यादों की किश्त (भाग -4)


सुना है बड़े शहरों के लोग अपनी उम्र किश्ते भरने में ही गुजार देते हैं

एक कर्ज मुझ पर भी हैं, तुम्हारी मोहब्बत का...
वही कर्ज जो हमने, अंजुरी भर गंगाजल को साक्षी रख के लिया था....

वक़्त बे वक़्त दस्तक दे देते हैं ख्वाब, मैं भी पल पल तुम्हारी यादों की किश्त भरता हूँ

अक्सर तकादा करने आ जाती हैं हिचकियाँ, अश्क़ो का ब्याज दर बहुत महँगा पड़ रहा हैं
आँखे मुरझा गयी हैं रोते रोते, कुछ ब्याज कम कर लो, कुछ मूल मैं चुका देता हूँ

पुराना कर्ज हैं, चुकते चुकते चुकेगा
किसी दिन आ जाओ, मिलकर हिसाब करते हैं,

मेरे सपने तुम्हारे दिल की तिजोरी में गिरवी रखे हैं, याद से लेते आना.....

हाँ, एक बात बताते जाना, क्या तुम भी किश्ते भरते हो???

        कवि प्रभात "परवाना"
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

खुदा पत्थर में रहे तो अच्छा है.....


मेरा सर तेरे दर पर रहे, तो अच्छा है
कुछ दर्द मुक्क़दर में, रहे तो अच्छा हैं
तेरे किस्से इसलिए जुबा पर, नहीं लाया
घर की बात घर में रहे, तो अच्छा हैं...

अश्क़ो की हिफाज़त, आँखों में है साहब
गंगा बस समंदर में रहे, तो अच्छा है
...

बुत-तराश को रोको, इसे शक्ल ना दे
ये खुदा पत्थर में रहे, तो अच्छा है
...

गाँव में राम ओ रहमा, साथ रहते हैं
शहरी लोग शहर में रहे, तो अच्छा है
...

 कवि प्रभात "परवाना"

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गुरुवार, 23 जून 2016

काफिर अब खुदा हो गया.....


इश्क़ और मोहब्बत में, ये क्या हो गया
जो दुनिया था वो, दुनिया जैसा हो गया...

मासूमियत से खुद आके, पूछने लगे मुझसे
वो कौन था कैसा था, और कैसा हो गया...

झूठ पर झूठ बोला तो, शाबाशियाँ मिली
जरा सच कह दिया, तो तमाशा हो गया...

जरा मुट्ठी भर राख लेकर, दिखा दो उन्हें
जिन्हे बुलंदी पे पहुँच कर, नशा हो गया...

मौका परस्ती की इम्तहां, देखिए साहब
जो कल काफिर था, अब खुदा हो गया...


 कवि प्रभात "परवाना"

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सोमवार, 4 अप्रैल 2016

गंगा किनारे वाले की डायरी : सब ठीक है (भाग -3)


सुनो, तुम्हे याद होगा उस शाम जब मैं गंगा माँ के किनारे बैठ कर यादो का सागर खंगाल रहा था, तब तुमने अचानक पीछे से आकर मेरी आँखों पर अपने हाथ रख दिए थे।


इससे पहले कि मैं कुछ बोल या समझ पाता तुमने अपने हाथ खुद ही हाथ हटा लिए थे।
मेरी आँखों कि नमी अब तुम्हारे हाथो पर तैर रही थी।
मैं जान चुका था कि आज फिर से तुम मेरे सामने एक बार वही सवाल लेके खड़े होगे, आज फिर से तुम जानना चाहोगे कि गंगा किनारे मैं अश्क़ो का समंदर लिए क्या कर रहा था
और तुम ये भी जानते थे कि आज फिर से मेरा जवाब वही होगा "कुछ नहीं हुआ, सब ठीक है"

हर बार की तरह तुमने उसी रेशम के दुपट्टे से मेरे आंसू पोछे जिसे मैंने वाराणसी के गोलघर बाजार से लाके तुम्हे दिया था।
ढलती शाम में एक चाँद गंगा की लहरों पर अठखेलियां ले रहा था और एक चाँद मेरे सामने आँखों में शबनम और सवाल लिए खड़ा था।

आसपास लोगो की चहलकदमी बढ़ने लगी थी, कही अश्क़ो का सैलाब संयम का बाँध ना तोड़ दे इस डर से हम दोनों ने खुद को संभाला | ख़ामोशी बहुत से सवाल - जवाब कर चुकी थी
अब बस शब्दों की औपचारिकता के लिए तुमने पूछा "बताओ हुआ क्या है, क्यों उदास हो?"

और मेरा वही जवाब था, "कुछ नहीं हुआ, सब ठीक है"

        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 28 दिसंबर 2015

गंगा किनारे वाले की डायरी : लकीरे (भाग -2)


गंगा किनारे वाले की डायरी : लकीरे (भाग -2)

याद है गंगा किनारे कई बार तुमने हाथ देखने के बहाने मेरा हाथ अपने हाथो में लिया था।
हाथ की आड़ी तिरछी रेखाओ से सफर करते आँखों के मोती साहिल पर आकर ठहर जाते।
उन आँखों में एक बादल का टुकड़ा था, जो बरसना चाहता था मगर हर बार तुम पलकों पर पहरा लगा देते।
शायद उस बादल में एक तिश्नगी थी, एक प्यास थी, जो तुम्हारे होठो के पनघट पर कुछ देर सुस्ताना चाहती थी

कभी समझ नहीं पाया की आखिर उन रेखाओ में क्या तलाशती हो तुम?
सवाल जैसी रेखाओ से जाने कौन कौनसे जवाब माँगती थी तुम?
मेरी हथेली पर टेढ़ी मेड़ी गलियो जैसी ये लकीरे क्या दे सकती थी तुम्हे?
ये लकीरे खुद अपना हासिल ढूढ़ते हुए, एक बुझे हुए छोर पर आकर खत्म हो जाती है

हिम्मत करके जिन हाथो को तुम पकड़ते थे, उसे हया के पहरेदार पल भर में अलग कर देते।
एक अल्हड़पन था तुम्हारे अंदर जैसे कबीर के दोहे, एक तन्मयता थी तुम्हारे अंदर जैसे मीरा के भजन हो, एक अपनापन था तुम्हारे अंदर जैसे रसखान के सवैये हो

गंगा माँ आज भी वहाँ से निकलती हैं वो भी अब पहले जैसी नहीं रही, वक़्त के आंधियो ने गंगा और इंसान दोनों को गहरे जख्म दे दिए है।
मैं आज भी वहाँ जाता हूँ पर, अब उस जगह कोई हाथ देखने वाला नही है, ना किसी की आँखों में प्यास है ना व्यवहार में अपनापन, और ना बोली में अल्हड़पन...

सब कुछ बदल गया है, अब सब कुछ बदल गया है..........


        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 9 दिसंबर 2015

कब अच्छा दिन आएगा?....


भूखी अंतड़ियोँ को किस दिन, एक निवाला जाएगा
और चुनावी वादो का कब, कर्ज उतारा जाएगा

बच्चा बच्चा पूछ रहा है, कब अच्छा दिन आएगा?....

सबसे ऊँची कुर्सी पाकर, अंहकार में फूल गए?
राम का मंदिर बनवाऊंगा, वादा शायद भूल गए
गंगा तट पर दोहराई जो, सारी रस्मे याद करो
छप्पन इंची सीने वाली, सारी कसमे याद करो

और किसानो के घर में, कब तक अँधियारा छाएगा?
सरहद पर कब तक फौजी का, शीश उतारा जाएगा?

बच्चा बच्चा पूछ रहा है, कब अच्छा दिन आएगा?....
बच्चा बच्चा पूछ रहा है, कब अच्छा दिन आएगा?....

कब तक भारत माता यूँ ही, हाय हाय चिल्लाएगी?
डायन कहने वालो की कब, जीभ काट दी जाएगी?
बड़ी बड़ी ना दे पाओ तो, चींजे कुछ छोटी दे दो
बुलेट ट्रेन देने से पहले, भारत को रोटी दे दो

फुटपाथों पर कब तक बचपन, आसूं रोज़ बहाएगा
इंसा खूं को बेच बेच कर, कब तक खाना खाएगा

बच्चा बच्चा पूछ रहा है, कब अच्छा दिन आएगा?....
बच्चा बच्चा पूछ रहा है, कब अच्छा दिन आएगा?....


इटली वाला कुनबा कब, वापस इटली को जाएगा
10 जनपथ पर बोलो मोदी, कब भगवा लहराएगा
और कबाड़ी जीजा बोलो, कब सड़को पर आएगा
मोदी जी मत मारो कह कर, कब पप्पू चिलाएगा

कालेधन वाली चिट्ठी का, चिटठा कब खुल पाएगा
और पकड़ कर कॉलर कब, दाऊद को पीटा जाएगा

बच्चा बच्चा पूछ रहा है, कब अच्छा दिन आएगा?....
बच्चा बच्चा पूछ रहा है, कब अच्छा दिन आएगा?....


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 2 नवंबर 2015

हिम्मत अब नही है.....

समंदर तक जाने की, हिम्मत अब नहीं है,
आंसू देख पाने की, हिम्मत अब नही है.....

चंद रोज में पढ़ डाली है, ढेर किताबे,
तेरे खत पढ़ पाने की, हिम्मत अब नहीं है
.....

समझ सको तो मेरी, खामोशी को समझो,
लब से कुछ कह पाने की, हिम्मत अब नही है
.....

तेरे बिन पल पल, कैसे काटा है,
वो सब कुछ दोहराने की, हिम्मत अब नहीं है
.....

बरसो पहले टूटा रिश्ता, फिर जोडू,
जीते जी मर जाने की, हिम्मत अब नही है
.....

वो हाथ पकड़ कर दूर तलक, चलते जाना,
यादो में खो जाने की, हिम्मत अब नही है
.....

मार सको तो सीने पर, आकर मारो,
पीठ में खंजर खाने की, हिम्मत अब नही है
.....

समंदर तक जाने की, हिम्मत अब नही है
आंसू देख पाने की, हिम्मत अब नही है
.....

        कवि प्रभात "परवाना"
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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

गंगा किनारे वाले की डायरी : लकीरे (भाग -1 ) पुराने पन्ने...

गंगा किनारे वाले की डायरी : लकीरे (भाग -1 ) पुराने पन्ने...


कल रात दराज में कुछ, पुराने सीलन भरे पन्ने मिले
पन्ने क्या थे, मेरा अतीत था....

एक पल रुक के सोचा उन्हें छूना, ठीक भी होगा या नहीं
कहीं ऐसा ना हो किसी पन्ने से तुम, मुस्कुराते नज़र आओ
या किसी पन्ने पर तुम्हारी, झूठी नाराजगी दबी हुई हो 
....

शायद किसी पन्ने पर उस किताब का नाम लिखा हो,
जिसकी अदला बदली के बहाने, हमारा रिश्ता परवान चढ़ा
....

याद है उन बच्चो के नाम जो हमने, शादी से पहले सोचे थे
सब इन्ही कागजो की किसी कतरन में लिखे होंगे 
....

कुछ और भी लिखा होगा इनमे, जिसे पढ़ने की हिम्मत अब नहीं है
इन्ही पन्नो में लिखी है वो कहानी जिसे, आगाज़ तो मिला पर अंजाम नहीं 
....

इन पन्नो में जो सीलन है, वो दरअसल मेरे और तुम्हारे आंसू हैं
जिन्हे हम गंगा किनारे, गंगा माँ को सौंप आये थे 
....

चलो आज और सोने देते हैं उन पन्नो को, अपने अतीत को, तुमको
हमारे आँसुओ को, और हर उस याद को जिसने हमें आज तक हम बना रखा है
....


        कवि प्रभात "परवाना"
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गुरुवार, 9 जुलाई 2015

रहबर बना लिया ...…


कांटो को सजा बिछा कर, बिस्तर बना लिया
लो हमने भी शहर-ए-ग़म में, घर बना लिया
दरिया चिढ़ाता था, जिन जिन बूंदों को कभी
उन सब बूंदों ने मिलकर, समंदर बना लिया...…

सबके सब रखते हो, संगतराषी का हुनर
लो हमने भी इस दिल को, पत्थर बना लिया...…

तेरे दो आँसुओ से बाज़ी, हार गए वरना
हुज़ूर जिसे चाहा उसे, अपना मुकद्दर बना लिया...…

किताब ए दोस्ती हर पन्ना, पढ़ लिया साहब
हमनें दुश्मनो को अपना, रहबर बना लिया ...…  

        कवि प्रभात "परवाना"
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शुक्रवार, 12 जून 2015

कुछ ना कुछ तो अंदर टूटा जरूर है.....


आँखे बता रही है, कुछ हुआ जरूर है
कुछ ना कुछ तो अंदर, टूटा जरूर है.....  
गिरते गिरते कई बार, संभला हूँ मैं
मेरे साथ किसी की, दुआ जरूर है 
.....

कल शब से ही, महकने लगा हूँ मैं
ख्वाब में सही, उसने छुआ जरूर है 
.....

खता करने से पहले, रोक दिया किसने
मेरे जहन में बैठा, कोई खुदा जरूर है 
.....

जिस्म क्या रूह भी, खुद की नही रहती
इश्क़ किया हो न हो, तजुर्बा जरूर है 
.....


        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 6 मई 2015

परवाने की मोहब्बत नहीं देखी......


तुमने दिल की सूनी, सरहद नहीं देखी
होंठो पर कैद है जो, गफलत नहीं देखी
मेरे महबूब से सामना, नहीं हुआ तेरा
मतलब तूने अब तक, क़यामत नहीं देखी ......

लकीरे तक मिटा दी मैंने, तेरे नाम की
तूने प्यार देखा है, मेरी नफरत नहीं देखी......

फर्श से अर्श तक सब कुछ, उसका हो गया
जिसमे सफर में पैर की, थकावट नहीं देखी......

मुहं पे राम बगल में, छुरी रखते है साहब
आपने अभी शरीफो की, शराफत नहीं देखी......

क्या करोगे मेरी कहानी, जानकर यारो
किसी चिराग की आंधी से, बगावत नहीं देखी......

ज़िंदगी ढूंढते है पागल, अंजाम-ए इश्क़ में
शमा से परवाने की, मोहब्बत नहीं देखी......

खुद को काट-काट कर, बनाएं है रास्ते
मेरी शोहरत देखी है, मेरी मेहनत नहीं देखी ....


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 6 अप्रैल 2015

जानता हूँ बिखर जाऊंगा....


इंसा है, और खुदा बनने की, चाहत करता है
नादान है, ऊपरी उसूलों से, शरारत करता है
जिसको हमने सिखाया, लब खोलने का हुनर
जरा बोलने लगा तो, हमसे बगावत करता है....

आखिर इस शहर को, क्या हो गया है हुज़ूर
यहाँ ज़िंदा शख्स मुर्दो से, शिकायत करता है
....

सियासत ने भी दंगो का, नुस्खा दे दिया
ये पूजा करता है, और ये इबादत करता है
....

जानता हूँ बिखर जाऊंगा, एक ना एक दिन
मैं वो शीशा हूँ जो पत्थर से, मोहब्बत करता है
....

फर्क ही क्या है तुझमे, और मुझमे बता दे
मैं पूजा करता हूँ और, तू इबादत करता है
.... 


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

रहबर बना लिया.....

कांटो को सजा बिछा कर, बिस्तर बना लिया
लो हमने भी शहर-ए-ग़म में, घर बना लिया
दरिया चिढ़ाता था जिन जिन, बूंदो को कभी
उन सब बूंदो ने मिलकर, समंदर बना लिया

सबके सब रखते हो ना, संगतराशी का हुनर
लो हमने भी इस दिल को, पत्थर बना लिया

बस तेरे दो आँसुओ से बाज़ी, हार गए वरना
हमने जिसे भी चाहा उसे, मुकद्दर बना लिया

खत-ए-दोस्ती का हर पन्ना, पढ़ लिया साहब
हमने दुश्मनो को अपना, रहबर बना लिया 


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com 


सोमवार, 17 नवंबर 2014

बेटी को ना गर्भ में मारो....


बेटी नारायण सेवा है, बेटी पुण्यो का मेवा है
सावन भादो मॉस है बेटी, जीवन का आभास है बेटी

बेटी नभ का पता है, बेटी आशा है, लता है
बेटी वंदना है, पूजा है , बेटी दौड़ती उषा है

बिन बेटी ये दुनिया मौन है, बेटी में हीमैरी कॉम है
बेटी कुल का मान बढ़ाती, बेटी वायुयान उड़ाती

बेटी रामायण गीता है, बेटी में एक युग जीता है
त्याग तपस्या भाव है बेटी, एक मधुर सा राग है बेटी

बेटी वेदो की परिभाषा है , बेटी ही भाग्य विधाता है
बेटी झरनो सी पावन है, बेटी से ही अपनापन है

वीणा की झंकार है बेटी, आँगन का श्रृंगार है बेटी,
कंघन की खनखन है बेटी,बेटा चंदा, चन्दन बेटी

उपवन की तितली है बेटी, नदियों की मछली है बेटी,
बेटी सागर की गहराई है, बेटी अम्बर की ऊंचाई है,

मात पिता का बल है बेटी, जीवन में मंगल है बेटी
बेटी बेटे की राखी है, लंग़डेपन की बैसाखी है

भैयादूज का टीका बेटी, कड़वेपन में मीठा बेटी
बेटे हक़, हकदार है बेटी, नवरात्रों का त्यौहार है बेटी

बेटी दो दो घर की लाज है,ज़िम्मेदारी का आभास है
कहीं बेटी रिक्शा खींच रही है, पूरे कुल को सींच रही है

कही गर्भ में मरती बेटी, जग में आकर मरती बेटी,
इस पल से ही भूल सुधारो, बेटी को ना गर्भ में मारो,

बेटी में एक अंश पलेगा, बेटी से ही वंश चलेगा
बेटी में एक अंश पलेगा, बेटी से ही वंश चलेगा


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 1 सितंबर 2014

फैसला बदलना नही आया.....


दोस्ती करके दोस्त को, परखना नहीं आया
ठोकर खाके भी नादाँ को, चलना नहीं आया
महज इस बात पर गिरगिट ने, खुदखुशी कर ली
उसे इंसा की तरह रंग, बदलना नहीं आया.....

लहुलुहान परिंदा मंजिल पे, पहुच कर बोला
शिकारी नया था, पंख कतरना नहीं आया.....

राख समेटता चला गया, ख़त बनते चले गये
तुम्हारे खतो को ठीक से, जलना नहीं आया.....

गुलिस्तां में फिर उसके, पर ही पर मिले
जिस भी तितली को फूल पे, संभलना नहीं आया.....

बुलंदियां मुझे इसलिए भी, हासिल ना हुई
मुझे जमीर का कहा फैसला, बदलना नही आया.....


        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 5 अगस्त 2014

रहनुमा, ढूंढता रहा .....

जाने सजदे में, क्या क्या ढूंढता रहा
इस ज़माने में इंसा, वफ़ा ढूंढता रहा
यहाँ जर्रा जर्रा, किसी सदमे में हैं
और मै शहर में रहनुमा, ढूंढता रहा .....

सुलग सुलग कर शहर, राख हो गया
एक पागल आसमां में, धुँआ ढूंढता रहा .....

बाती अँधेरे में, सिसकियाँ भरती रही
एक चिराग रात भर, हवा ढूंढता रहा .....

इश्क लाइलाज है, सभी जानते हैं मगर
हर हकीम इस मर्ज की, दवा ढूंढता रहा.....

बच्चे, फ़कीर, माँ पर, नज़र नहीं गयी
और इंसा मस्जिद में, खुदा ढूंढता रहा..... 


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 30 जून 2014

जरूरी तो नहीं......

इस दस्तक पर, मेहमां भी हो सकता है
हर बार ही हवा हो, जरूरी तो नहीं
.....

कसूर हालात का भी, हो सकता है
हर शख्स बेवफा हो, जरूरी तो नहीं
.....

मेरे हमदर्दो में ही, बैठा है कातिल
हर लब पे दुआ हो, जरूरी तो नहीं
.....

लाश पे जख्म-ए-मोहब्बत, है साहब
मेरा क़त्ल ही हुआ हो, जरूरी तो नहीं
.....

उसका एक एक सितम, लाइलाज निकला
हर जख्म की दवा हो, जरूरी तो नहीं
.....

माँ की आँखे भी पढ़ कर, देखिये जनाब
मस्जिद में ही ख़ुदा हो, जरूरी तो नहीं.....  


        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 10 जून 2014

हमको हालातो से लड़ना आता है....


उनको ग़म के आंसू, पीना आता है
हमको भीगी आँखे, पढ़ना आता है
खंजर खाके, इस महफ़िल तक आये है
हमको हालातो से, लड़ना आता है.....

ऐ पत्थर दिल, तेरी कड़वी यादो से
हमको मीठी ग़ज़लें, गढ़ना आता है.....

पढ़ ले तो तेरी आँखे, भी रो देंगीं
हमको ख़त में आँसू, भरना आता है.....

बस इतना ही सीखा है, इस दुनिया में
वादे की खातिर जीना, मरना आता है.....

कह देते हो सारी बाते, आंखो से
तुमको भी क्या खूब, करीना आता है.....

चादर तकिये मे कई, समंदर रखते हैं
दिलवालो को क्या क्या, करना आता है.....

      कवि प्रभात "परवाना"
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