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मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

समंदर का सफ़र देख लेंगें.....


हौसला आजमा कर मुकद्दर भी लेंगे
कश्ती पे तूफां का, असर भी देख लेंगे
दरिया भी हमने, तनहा ही नापा था
हम समंदर का, सफ़र भी देख लेंगें.....

दर दर पर भटकते, फिरे है उम्र भर
एक तेरा बचा है, ये दर भी देख लेंगें
.....

आज दुश्मन के हाथ, दवा देखी है
अब दोस्त के हाथ पत्थर, भी देख लेंगें
.....

चलो सो जाते है, कफ़न ओढ़ कर
इस बहाने खुदा का, घर भी देख लेंगें
.....
        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

सोमवार, 31 मार्च 2014

हंगामा खड़ा कर दिया मैंने.....



हाय! नादानी में ,क्या कर लिया मैंने
दोस्तो से कुछ, मश्वरा कर लिया मैंने
उसकी अमानत कहीं, गुम ना हो जाए
जख्म-ए-दिल को, हरा कर लिया मैंने .....

बेखुदी में अपने खुदा का, दर छोड़ कर
काफिर के दर पे, सजदा कर लिया मैंने.....

सच की खातिर सूली, चढ़ गया लेकिन
इस शहर में हंगामा, खड़ा कर दिया मैंने.....

दुनिया के मुताबिक मैं, बदल ना सका
दुनिया बदलने का फैसला, कर लिया मैंने.....




        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com

मंगलवार, 18 मार्च 2014

आखिर चाहता क्या है?


यूँ ज़रा ज़रा करके, सताता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

तू खुदा मै नाखुदा, मान तो लिया मैंने
बाराह रुक रुक कर, जताता क्या है ?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

ग़मो की आंच पर, सुलगती है खुशियाँ
दुनिया की हांडी में, पकाता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

ज़िंदगी का बोझ अब, ढोया नहीं जाता
मेरी रोक दे साँसे, तेरा जाता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

आफ़ताब कौन देगा?


उसके दर पर नकाब, कौन देगा?
तेरे कर्मो का हिसाब, कौन देगा?
किसी पर सितम से पहले, सोच लेना
कल उस खुद को जवाब, कौन देगा?

आइना देखकर, इतराने वाले
ढलती उम्र में शबाब, कौन देगा?

ज़रा रौशनी में, ढूंढ लूँगा मंज़िल
इस जुगनू को आफ़ताब, कौन देगा?

आखिरी दहलीज पर बेटे, मुहँ मोड़ गए
अब उसकी चिता को आग, कौन देगा?

फिर एक दंगा चाहती है, सियासत
वरना दैरो-हरम में शराब, कौन देगा?


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

सोमवार, 6 जनवरी 2014

हिम्मत कम नहीं होती.....



लाख कोशिश करू मैं, दिक्कत कम नहीं होती
उस खुदा की भी मुझपे रहमत, कम नहीं होती
छोटी उम्र में इतना, तजुर्बा तो कमाया है
दिल नेक हो तो घर में, बरक्कत कम नहीं होती

जुदाई महज इश्क का, इम्तेहान लगता है
फासला बढ़ता जाता है, मोहब्बत कम नहीं होती

समंदर में नदियों के जैसी, बढती जाती है
माँ के हाथ के खाने में लज्जत, कम नहीं होती

खुदा के इश्क में रांझे सा, हाल है मेरा
पत्थर खाता जाता हूँ, इबादत कम नहीं होती

मेरे हौसले की बस, इतनी सी कहानी है
परिंदा पर से घायल है, पर हिम्मत कम नहीं होती

        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

दोहरी ज़ुबान नहीं आती .……


लाख कोशिश करो, मुस्कान नहीं आती
चली जाए जिस्म से, फिर जान नहीं आती
ज़रा सी बात में, दिल निकाल कर रख दिया
सच, मुझे इंसान की, पहचान नहीं आती.……

बहेलिये मुझे मार, मगर उसे बक्श दे
परिंदा छोटा है, अभी उड़ान नहीं आती .……

तलवे चाट सकते तो, आगे बढ़ गए होते
कमी ये है, हमें दोहरी ज़ुबान नहीं आती .……

ज़िंदा का लहू, मुर्दे का कफ़न तक खा गयी
ये सियासी हवस, कभी लगाम नहीं आती.……



        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com




सोमवार, 4 नवंबर 2013

हम सरकार बदल देंगे........


तेल और तेल की धार, बदल देंगे,
ठान लिया तो संसार, बदल देंगे,
लूट, चोरी, सीनाजोरी बहुत हो चुकी अब तलक
वक़्त आ गया है, हम सरकार बदल देंगे ..........

शबनम को, आग लिखेंगे
इश्क़ को, इंकलाब लिख्नेगे
दिल में बैठा फनकार बदल देंगे
लूट चोरी , सीनाजोरी बहुत हो चुकी अब तलक
वक़्त आ गया है, हम सरकार बदल देंगे ..........


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


सोमवार, 23 सितंबर 2013

भूल जाता है .....


जन्नत-ओं-जहानुम्म में अंतर, भूल जाता है,
नशे में इंसा, पीर पैगंबर भूल जाता है.…

बुलंदियों पर चढ़ते ही, कतरा आजकल,
मीलो गहरा है समंदर, भूल जाता है.…

ज़रा वाहवाही, क्या मिली ज़माने से,
मदारी के हाथो में है बन्दर, भूल जाता है.…

उम्र भर समेटता है, दौलत बेवजह
खाली हाथ गया था सिकंदर, भूल जाता है.…


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com 


गुरुवार, 12 सितंबर 2013

अश्क जो माँ बाप की आँखों में गए ...


बारिश में जैसे जलता दीया ऐसे  जला  हूँ,
हर वक़्त, हर हालात, कसौटी पे खरा हूँ,
ये आंधियाँ रोकेंगी क्या अब मेरा रास्ता 
बुजुर्गों की दुआओ को घर से लेके चला हूँ,

मिट्टी है कि तुम, पूरी दुनिया में छा गए,
तो क्या हुआ जो, हर किसी के दिल को भा गए 
धर्म, पुन्य, तीर्थ सारे व्यर्थ हो गए 
अश्क जो माँ बाप की,आँखों में गए 

        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com 


बुधवार, 28 अगस्त 2013

पूजा जिस जिस को मैंने......


पूजा जिस जिस को मैंने, परवरदिगार की तरह,
हर उस शख्स ने मुझे देखा, गुनेहगार की तरह 
दौलत भी क्या शय है, तब मालूम हुआ मुझको
जब अदालत गवाह सब बिक गए, अखबार की तरह......

रोज़ नए वादे करना, और रोज़ मुकर जाना
तुम भी पेश आ रहे हो, सरकार की तरह......

हर बार तुमसे उम्मीद, लगाता रहा ये दिल,
और तुम तोड़ती रही उम्मीद, हर बार की तरह......

तेरे ग़म की स्याही से, जब जब कुछ लिखा हमने
हर नज़र में आ गए हम, इश्तेहार की तरह .......

गुल-ओ-गुलशन से भर दिया, दामन मेरा एक पल
और फिर चले गए ठुकरा कर, किसी बहार की तरह ......



        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

कृष्ण तुम्हे अब आना होगा......


कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा …

कृष्ण तुम्हे अब आना होगा,कृष्ण तुम्हे अब आना होगा ......

त्राहि त्राहि सभी दिशाए
हमें बचाओ ,सब चिल्लाये
जल्लादों की भरमार पड़ी
गौ कटने को तैयार खड़ी .........

मीठी धुन की बंसी तज कर, तुमको शस्त्र उठाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा

कंसो सा आचार हो गया
पशुओ सा व्यवहार हो गया
देखो मानव नंगा होकर
बिकने को तैयार हो गया 
 .........

भगवन तुमको रन में आकर, गीता ज्ञान सुनाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा 

देखे औलादों के खेले,
मात-पिता को घर से ठेले
गुरुजन का सम्मान नहीं है,
भगवन की पहचान नहीं है
 .........

मोहन तुमको सौं जमुना की,सब पटरी पर लाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


सोमवार, 8 जुलाई 2013

एहसान लेना गवारा नहीं लगता.....


बच्चो के भूखे पेट को, पहचान लेता है,
पिता एक रोटी हिस्सों में, बाँट देता है,
माँ बीमार, चून ख़तम, लकडियाँ गीली,
आज फिर नहीं जलूँगा, चूल्हा भांप लेता है .....


एहसान लेना ज़मीर को, गवारा नहीं लगता
मुफलिस एक चादर में, सर्द राते काट लेता है .....

चुल्लू भर पानी में, वो शख्स, डूब मर जाए,
अपने काम की खातिर, जो तलवे चाट लेता है .....

बुरे वक़्त से कहाँ तक, बच सकोगे आप,
आदमी ऊंट पर बैठा हो, कुत्ता काट लेता है .....



        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

राजस्थान के मदर टेरेसा कालेज में कार्यक्रम....


मित्रो कुछ समय पहले राजस्थान के मदर टेरेसा कालेज में एक कार्यक्रम के आयोजन पर प्रस्तुति करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ,
कार्यक्रम पूरी तरह सफल रहा , वहाँ के बच्चो ने कार्यक्रम को सफल बनाने में पूरा साथ दिया,
बहुत से मित्रो ने कार्यक्रम की विडियो देखने की इच्छा जाहिर की थी ,
साथियो पूरी विडियो तो नहीं मिल पायी परन्तु काव्य पाठ करते हुए एक अंश जरूर मिला है,

आप सभी का प्यार बना रहे तो जल्द ही आपके शहर में भी एक कार्यक्रम का आयोजन होगा,
अगर आप किसी भी प्रकार का सुझाव या प्रतिक्रिया देना चाहते है तो बेहिचक
theprabhatparwana@gmail.com
पर मेल करे,

और हाँ विडिओ देखना ना भूले : http://www.youtube.com/watch?v=FyVSu_cZmbU





        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com




मंगलवार, 2 जुलाई 2013

श्यामलाल कॉलेज में हास्य कार्यक्रम ....


मित्रो आपके स्नेह और प्यार को शब्दों में बाँध पाना बहुत मुश्किल है ,
इस समाज से उम्मीद से ज्यादा प्यार मिला है , सभी का दिल से आभार ......
अभी कुछ दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ,

आयोजन श्यामलाल कॉलेज में हुआ , कार्यक्रम इतना अच्छा रहा कि आने वाले कार्यक्रमों का निमंत्रण पहले ही मिल गया,
सभी श्रोताओं ने भरपूर सहयोग किया, हँसते हँसाते कब समय बीत गया कुछ पता ही नहीं चला ,
अभी कुछ रोज़ पहले ही तो घर से निकले थे खाली हाथ, बस अपना जज्बा और माँ पिता, ईश्वर की दुआए साथ थी।
ये आप लोगो का प्यार ही है जिसने प्रभात को प्रभात "परवाना" तक का सफ़र तय करने की हिम्मत दी,

कार्यक्रम की विडिओ लिंक देखने के लिए कई मित्रो के मेल आये, लिंक यू -ट्यूब पर अपलोड कर दी गयी है
आशा है आप सभी को पसंद आएगी




        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


सोमवार, 1 जुलाई 2013

आईने काले हो गए


सच्चाई के आईने, काले हो गए,
बुझदिलो के घर में, उजाले हो गए,
झूठ बाज़ार में, बेख़ौफ़ बिकता रहा,
मैंने सच कहा तो, जान के लाले हो गए.....

लहू बेच बेच कर, जिसने, औलादे पाली,
भूखा सो गया, जब बच्चे कमाने वाले हो गए
.....

लहजा मीठा, मिजाज़ नरम, आँखों में शरम,
सब बदल गया, जब वो शहर वाले हो गए
.....

अपनी कमाई से, एक झोपड़ी ना बना सके,
वो सियासत में आये, तो महल वाले हो गए
.....


        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 4 जून 2013

सहमी-सहमी....


हैवान बन गया है, इंसान इस कदर
इंसानियत नज़र आती है, सहमी-सहमी,

सन्नाटो से पूछिए, उस रात का मंजर,
हर चीख नज़र आती है, सहमी-सहमी,

निकल पड़े है लोग, बेख़ौफ़ से बनकर
पर भीड़ नज़र आती है, सहमी-सहमी,

गवाहों की आँख में, आहिस्ते से देखिये
हर नजर नज़र आती है, सहमी-सहमी,

सजदो पे बंदिशे, मंदिरों में ताले,
अब अजान नज़र आती है, सहमी-सहमी,

महफूज़ नहीं वो, जो घर से निकल गया,
ये दहलीज़ नज़र आती है, सहमी-सहमी


        कवि प्रभात "परवाना"
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शुक्रवार, 17 मई 2013

अपनी अलग पहचान रखते हैं.....


दिल में ग़म, लबो पे मुस्कान रखते हैं,
भीड़ में अपनी ,अलग पहचान रखते हैं,

फकीरों के ठाठ, हमने अपना लिए 
पैरो में ज़मीं, सर पर आसमां  रखते है .....

हमारी मुफलिसी खुद्दारी, मार नहीं सकती,
उन्हें बता दो, शौक-ए गुलाम रखते है .....

नए शहर के नए उसूल, समझ नहीं आते,
खामोश रहते हैं, काम से काम रखते हैं.....

शहर के नामचीन भी, अजीब होते हैं
दीन धर्म ईमान, सबके दाम रखते है.....

मुट्ठी भर राख में, सिमटना है एक दिन,
फिर क्यों लोग इतना गुमान रखते है ?.....

इस चका-चौंध में, कहीं भटक ना जायें
इसलिए हम खुदा से, दुआ-सलाम रखते हैं.....

ये गाँव नहीं शहर है, संभलिये, साहब
यहाँ बगल में छुरी, मुहँ में राम रखते हैं .....




        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 14 मई 2013

मैकदा बचा लिया ....


आप ही कीजिये, मंदिर मस्जिद में सजदा
हमने मैकदे के पास ही, घर बना लिया .....

औरो से कुछ हटकर, उसूल है हमारा,
जहा मैकदा देखा, वही सर झुका लिया .....


मरीज-ए-इश्क- ने, क्या खूब मर्ज निकाला 
हुस्न को छोड़कर, मय से दिल लगा लिया .....

अंगूर की जवानी से, कुछ यू सजा मैकदा
शेख जी ने मैकदे को, जन्नत बता दिया .....

दंगो की आग में, जल गया शहर सारा
कुछ रिंदो ने मिलकर ,मैकदा बचा लिया .....



        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com



शनिवार, 4 मई 2013

मुझे मैखाने की आदत नहीं

हर साक़ी, हर पैमाने को है,
ये ख़बर, ज़माने को है,
मुझे मैखाने की आदत नहीं,
मेरी आदत, मैख़ाने को है .....

शेख जी आज बिन पिए ही चले गए,
लगता है कोई तूफां, आने को है .....

बस्ती जलाकर जिसने महल बनाया है 
पहला खतरा उसके आशियाने को है .....


        कवि प्रभात "परवाना"
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गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

आईने से नज़रे मिला लीजिये .......


आँखों में नमी, दिल परेशां क्यों है,
मैं सब बता दूंगा, दो घूँट पिला दीजिये.......

और नशा शराब का यकीनन बढेगा,
इसमें अश्क मेरे, मिला दीजिये.......

गलती इंसान से नहीं तो क्या खुद से होगी,
क्यू खामखा, किसी से गिला कीजिये.......

खुद से मोहब्बत, आपको हो जाएगी
आईने से नज़रे, मिला लीजिये .......



        कवि प्रभात "परवाना"
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