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सोमवार, 1 सितंबर 2014

फैसला बदलना नही आया.....


दोस्ती करके दोस्त को, परखना नहीं आया
ठोकर खाके भी नादाँ को, चलना नहीं आया
महज इस बात पर गिरगिट ने, खुदखुशी कर ली
उसे इंसा की तरह रंग, बदलना नहीं आया.....

लहुलुहान परिंदा मंजिल पे, पहुच कर बोला
शिकारी नया था, पंख कतरना नहीं आया.....

राख समेटता चला गया, ख़त बनते चले गये
तुम्हारे खतो को ठीक से, जलना नहीं आया.....

गुलिस्तां में फिर उसके, पर ही पर मिले
जिस भी तितली को फूल पे, संभलना नहीं आया.....

बुलंदियां मुझे इसलिए भी, हासिल ना हुई
मुझे जमीर का कहा फैसला, बदलना नही आया.....


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com 


मंगलवार, 5 अगस्त 2014

रहनुमा, ढूंढता रहा .....

जाने सजदे में, क्या क्या ढूंढता रहा
इस ज़माने में इंसा, वफ़ा ढूंढता रहा
यहाँ जर्रा जर्रा, किसी सदमे में हैं
और मै शहर में रहनुमा, ढूंढता रहा .....

सुलग सुलग कर शहर, राख हो गया
एक पागल आसमां में, धुँआ ढूंढता रहा .....

बाती अँधेरे में, सिसकियाँ भरती रही
एक चिराग रात भर, हवा ढूंढता रहा .....

इश्क लाइलाज है, सभी जानते हैं मगर
हर हकीम इस मर्ज की, दवा ढूंढता रहा.....

बच्चे, फ़कीर, माँ पर, नज़र नहीं गयी
और इंसा मस्जिद में, खुदा ढूंढता रहा..... 


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com 


सोमवार, 30 जून 2014

जरूरी तो नहीं......

इस दस्तक पर, मेहमां भी हो सकता है
हर बार ही हवा हो, जरूरी तो नहीं
.....

कसूर हालात का भी, हो सकता है
हर शख्स बेवफा हो, जरूरी तो नहीं
.....

मेरे हमदर्दो में ही, बैठा है कातिल
हर लब पे दुआ हो, जरूरी तो नहीं
.....

लाश पे जख्म-ए-मोहब्बत, है साहब
मेरा क़त्ल ही हुआ हो, जरूरी तो नहीं
.....

उसका एक एक सितम, लाइलाज निकला
हर जख्म की दवा हो, जरूरी तो नहीं
.....

माँ की आँखे भी पढ़ कर, देखिये जनाब
मस्जिद में ही ख़ुदा हो, जरूरी तो नहीं.....  


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com

मंगलवार, 10 जून 2014

हमको हालातो से लड़ना आता है....


उनको ग़म के आंसू, पीना आता है
हमको भीगी आँखे, पढ़ना आता है
खंजर खाके, इस महफ़िल तक आये है
हमको हालातो से, लड़ना आता है.....

ऐ पत्थर दिल, तेरी कड़वी यादो से
हमको मीठी ग़ज़लें, गढ़ना आता है.....

पढ़ ले तो तेरी आँखे, भी रो देंगीं
हमको ख़त में आँसू, भरना आता है.....

बस इतना ही सीखा है, इस दुनिया में
वादे की खातिर जीना, मरना आता है.....

कह देते हो सारी बाते, आंखो से
तुमको भी क्या खूब, करीना आता है.....

चादर तकिये मे कई, समंदर रखते हैं
दिलवालो को क्या क्या, करना आता है.....

      कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com



मंगलवार, 3 जून 2014

नशे भी हमने खुद्दारी नही छोड़ीं....

दुश्मनों ने भी ताउम्र, दुश्मनी नहीं छोड़ी
हम मौत से लड़े पर, ज़िंदगी नहीं छोड़ी
खुद को जला कर तब, रोशन किया मकां
जब अंधेरो ने मेरे घर मे, रौशनी नहीं छोड़ीं.....

जाम इस तरह पीया, कि तोबा नही टुटे
साहब नशे भी हमने, खुद्दारी नही छोड़ीं.....

अपने कातिल को खुद, खंज़र दे दिया
चकाचौंध मे भी हमने, सादगी नही छोड़ी.....

एक नकाब हटा कर, दूसरा लगा लिया
सियासत ने आवाम से, गद्दारी नहीं छोड़ी.....

मस्जिद नहीं गया, माँ का सजदा कर लिया
जिस तरह भी की, हमने बंदगी नही छोड़ीं.....


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com


मंगलवार, 20 मई 2014

तिरंगा बना दिया......


हम क्या थे और हमे, क्या बना दिया
उसकी महर ने हमे, बंदा बना दिया
मुफ़लिस बच्चे ने पूछा, रोटी क्या शय है
मैंने कलम उठायी और, चंदा बना दिया

अँधेरे हर पल मुझे, रास्ता दिखाते रहे
इस चकाचौंध ने मुझे, अंधा बना दिया

एक ज़माना था, इबादत-ए-शायरी का
कुछ खुदगर्जों ने इसे, धंधा बना दिया

मौत को रंगीनिया अता की, इस तरह
मैंने कफ़न रंग दिया, तिरंगा बना दिया। 

        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com

सोमवार, 12 मई 2014

खरीद के ला तो मानू........


बिंदिया, पाजेब, कुमकुम खरीद लाया
सच्ची ख़ुशी खरीद के ला, तो मानू .....

बदन खरीद लाया, हवस मिटाने को
दिलकशी खरीद के ला, तो मानू .....

दो चार मैकदों से, मेरा क्या होगा?
बेखुदी खरीद के ला, तो मानू .....

चाँद पर ज़मीं खरीद बैठा, पागल
चाँदनी खरीद के ला, तो मानू.....

पैसा पैसा पैसा पैसा, अरे गुरूरबाज़
ज़रा ज़िंदगी खरीद के ला, तो मानू.....


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com

गुरुवार, 1 मई 2014

हौसले का अंजाम मत पूछिये.....


ये किसने भेजा है पैगाम, मत पूछिये
किसका ख़त है मेरे नाम, मत पूछिये
मोहब्बते बाँटने घर से, जब जब चला
मुझपे लग गया इल्जाम, मत पूछिये.....

मेरा सच ठोकर पर, ठोकरें खाता रहा
झूठ को ही मिला इनाम, मत पूछिये.....

चंद दिनों में वो, अमीर-ए-शहर हो गया
बन्दा क्या करता है काम, मत पूछिये.....

सूली चढ़ा दिया ना, शहर के बींचो बीच
नादान हौसले का अंजाम, मत पूछिये.....

लो अपनों को एक एक, राज बता बैठा
मैं भी हो ही गया बदनाम, मत पूछिये.....

अब इबादत पर भी, सयासी हक़ हो गया
सजदा भी कर दिया हराम, मत पूछिये.....


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com



मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

समंदर का सफ़र देख लेंगें.....


हौसला आजमा कर मुकद्दर भी लेंगे
कश्ती पे तूफां का, असर भी देख लेंगे
दरिया भी हमने, तनहा ही नापा था
हम समंदर का, सफ़र भी देख लेंगें.....

दर दर पर भटकते, फिरे है उम्र भर
एक तेरा बचा है, ये दर भी देख लेंगें
.....

आज दुश्मन के हाथ, दवा देखी है
अब दोस्त के हाथ पत्थर, भी देख लेंगें
.....

चलो सो जाते है, कफ़न ओढ़ कर
इस बहाने खुदा का, घर भी देख लेंगें
.....
        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 31 मार्च 2014

हंगामा खड़ा कर दिया मैंने.....



हाय! नादानी में ,क्या कर लिया मैंने
दोस्तो से कुछ, मश्वरा कर लिया मैंने
उसकी अमानत कहीं, गुम ना हो जाए
जख्म-ए-दिल को, हरा कर लिया मैंने .....

बेखुदी में अपने खुदा का, दर छोड़ कर
काफिर के दर पे, सजदा कर लिया मैंने.....

सच की खातिर सूली, चढ़ गया लेकिन
इस शहर में हंगामा, खड़ा कर दिया मैंने.....

दुनिया के मुताबिक मैं, बदल ना सका
दुनिया बदलने का फैसला, कर लिया मैंने.....




        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com

मंगलवार, 18 मार्च 2014

आखिर चाहता क्या है?


यूँ ज़रा ज़रा करके, सताता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

तू खुदा मै नाखुदा, मान तो लिया मैंने
बाराह रुक रुक कर, जताता क्या है ?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

ग़मो की आंच पर, सुलगती है खुशियाँ
दुनिया की हांडी में, पकाता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

ज़िंदगी का बोझ अब, ढोया नहीं जाता
मेरी रोक दे साँसे, तेरा जाता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?


        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

आफ़ताब कौन देगा?


उसके दर पर नकाब, कौन देगा?
तेरे कर्मो का हिसाब, कौन देगा?
किसी पर सितम से पहले, सोच लेना
कल उस खुद को जवाब, कौन देगा?

आइना देखकर, इतराने वाले
ढलती उम्र में शबाब, कौन देगा?

ज़रा रौशनी में, ढूंढ लूँगा मंज़िल
इस जुगनू को आफ़ताब, कौन देगा?

आखिरी दहलीज पर बेटे, मुहँ मोड़ गए
अब उसकी चिता को आग, कौन देगा?

फिर एक दंगा चाहती है, सियासत
वरना दैरो-हरम में शराब, कौन देगा?


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 6 जनवरी 2014

हिम्मत कम नहीं होती.....



लाख कोशिश करू मैं, दिक्कत कम नहीं होती
उस खुदा की भी मुझपे रहमत, कम नहीं होती
छोटी उम्र में इतना, तजुर्बा तो कमाया है
दिल नेक हो तो घर में, बरक्कत कम नहीं होती

जुदाई महज इश्क का, इम्तेहान लगता है
फासला बढ़ता जाता है, मोहब्बत कम नहीं होती

समंदर में नदियों के जैसी, बढती जाती है
माँ के हाथ के खाने में लज्जत, कम नहीं होती

खुदा के इश्क में रांझे सा, हाल है मेरा
पत्थर खाता जाता हूँ, इबादत कम नहीं होती

मेरे हौसले की बस, इतनी सी कहानी है
परिंदा पर से घायल है, पर हिम्मत कम नहीं होती

        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

दोहरी ज़ुबान नहीं आती .……


लाख कोशिश करो, मुस्कान नहीं आती
चली जाए जिस्म से, फिर जान नहीं आती
ज़रा सी बात में, दिल निकाल कर रख दिया
सच, मुझे इंसान की, पहचान नहीं आती.……

बहेलिये मुझे मार, मगर उसे बक्श दे
परिंदा छोटा है, अभी उड़ान नहीं आती .……

तलवे चाट सकते तो, आगे बढ़ गए होते
कमी ये है, हमें दोहरी ज़ुबान नहीं आती .……

ज़िंदा का लहू, मुर्दे का कफ़न तक खा गयी
ये सियासी हवस, कभी लगाम नहीं आती.……



        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 4 नवंबर 2013

हम सरकार बदल देंगे........


तेल और तेल की धार, बदल देंगे,
ठान लिया तो संसार, बदल देंगे,
लूट, चोरी, सीनाजोरी बहुत हो चुकी अब तलक
वक़्त आ गया है, हम सरकार बदल देंगे ..........

शबनम को, आग लिखेंगे
इश्क़ को, इंकलाब लिख्नेगे
दिल में बैठा फनकार बदल देंगे
लूट चोरी , सीनाजोरी बहुत हो चुकी अब तलक
वक़्त आ गया है, हम सरकार बदल देंगे ..........


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 23 सितंबर 2013

भूल जाता है .....


जन्नत-ओं-जहानुम्म में अंतर, भूल जाता है,
नशे में इंसा, पीर पैगंबर भूल जाता है.…

बुलंदियों पर चढ़ते ही, कतरा आजकल,
मीलो गहरा है समंदर, भूल जाता है.…

ज़रा वाहवाही, क्या मिली ज़माने से,
मदारी के हाथो में है बन्दर, भूल जाता है.…

उम्र भर समेटता है, दौलत बेवजह
खाली हाथ गया था सिकंदर, भूल जाता है.…


        कवि प्रभात "परवाना"
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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

अश्क जो माँ बाप की आँखों में गए ...


बारिश में जैसे जलता दीया ऐसे  जला  हूँ,
हर वक़्त, हर हालात, कसौटी पे खरा हूँ,
ये आंधियाँ रोकेंगी क्या अब मेरा रास्ता 
बुजुर्गों की दुआओ को घर से लेके चला हूँ,

मिट्टी है कि तुम, पूरी दुनिया में छा गए,
तो क्या हुआ जो, हर किसी के दिल को भा गए 
धर्म, पुन्य, तीर्थ सारे व्यर्थ हो गए 
अश्क जो माँ बाप की,आँखों में गए 

        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 28 अगस्त 2013

पूजा जिस जिस को मैंने......


पूजा जिस जिस को मैंने, परवरदिगार की तरह,
हर उस शख्स ने मुझे देखा, गुनेहगार की तरह 
दौलत भी क्या शय है, तब मालूम हुआ मुझको
जब अदालत गवाह सब बिक गए, अखबार की तरह......

रोज़ नए वादे करना, और रोज़ मुकर जाना
तुम भी पेश आ रहे हो, सरकार की तरह......

हर बार तुमसे उम्मीद, लगाता रहा ये दिल,
और तुम तोड़ती रही उम्मीद, हर बार की तरह......

तेरे ग़म की स्याही से, जब जब कुछ लिखा हमने
हर नज़र में आ गए हम, इश्तेहार की तरह .......

गुल-ओ-गुलशन से भर दिया, दामन मेरा एक पल
और फिर चले गए ठुकरा कर, किसी बहार की तरह ......



        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

कृष्ण तुम्हे अब आना होगा......


कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा …

कृष्ण तुम्हे अब आना होगा,कृष्ण तुम्हे अब आना होगा ......

त्राहि त्राहि सभी दिशाए
हमें बचाओ ,सब चिल्लाये
जल्लादों की भरमार पड़ी
गौ कटने को तैयार खड़ी .........

मीठी धुन की बंसी तज कर, तुमको शस्त्र उठाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा

कंसो सा आचार हो गया
पशुओ सा व्यवहार हो गया
देखो मानव नंगा होकर
बिकने को तैयार हो गया 
 .........

भगवन तुमको रन में आकर, गीता ज्ञान सुनाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा 

देखे औलादों के खेले,
मात-पिता को घर से ठेले
गुरुजन का सम्मान नहीं है,
भगवन की पहचान नहीं है
 .........

मोहन तुमको सौं जमुना की,सब पटरी पर लाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


सोमवार, 8 जुलाई 2013

एहसान लेना गवारा नहीं लगता.....


बच्चो के भूखे पेट को, पहचान लेता है,
पिता एक रोटी हिस्सों में, बाँट देता है,
माँ बीमार, चून ख़तम, लकडियाँ गीली,
आज फिर नहीं जलूँगा, चूल्हा भांप लेता है .....


एहसान लेना ज़मीर को, गवारा नहीं लगता
मुफलिस एक चादर में, सर्द राते काट लेता है .....

चुल्लू भर पानी में, वो शख्स, डूब मर जाए,
अपने काम की खातिर, जो तलवे चाट लेता है .....

बुरे वक़्त से कहाँ तक, बच सकोगे आप,
आदमी ऊंट पर बैठा हो, कुत्ता काट लेता है .....



        कवि प्रभात "परवाना"
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