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गुरुवार, 1 मई 2014

हौसले का अंजाम मत पूछिये.....


ये किसने भेजा है पैगाम, मत पूछिये
किसका ख़त है मेरे नाम, मत पूछिये
मोहब्बते बाँटने घर से, जब जब चला
मुझपे लग गया इल्जाम, मत पूछिये.....

मेरा सच ठोकर पर, ठोकरें खाता रहा
झूठ को ही मिला इनाम, मत पूछिये.....

चंद दिनों में वो, अमीर-ए-शहर हो गया
बन्दा क्या करता है काम, मत पूछिये.....

सूली चढ़ा दिया ना, शहर के बींचो बीच
नादान हौसले का अंजाम, मत पूछिये.....

लो अपनों को एक एक, राज बता बैठा
मैं भी हो ही गया बदनाम, मत पूछिये.....

अब इबादत पर भी, सयासी हक़ हो गया
सजदा भी कर दिया हराम, मत पूछिये.....


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com



सोमवार, 6 जनवरी 2014

हिम्मत कम नहीं होती.....



लाख कोशिश करू मैं, दिक्कत कम नहीं होती
उस खुदा की भी मुझपे रहमत, कम नहीं होती
छोटी उम्र में इतना, तजुर्बा तो कमाया है
दिल नेक हो तो घर में, बरक्कत कम नहीं होती

जुदाई महज इश्क का, इम्तेहान लगता है
फासला बढ़ता जाता है, मोहब्बत कम नहीं होती

समंदर में नदियों के जैसी, बढती जाती है
माँ के हाथ के खाने में लज्जत, कम नहीं होती

खुदा के इश्क में रांझे सा, हाल है मेरा
पत्थर खाता जाता हूँ, इबादत कम नहीं होती

मेरे हौसले की बस, इतनी सी कहानी है
परिंदा पर से घायल है, पर हिम्मत कम नहीं होती

        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


मंगलवार, 2 जुलाई 2013

श्यामलाल कॉलेज में हास्य कार्यक्रम ....


मित्रो आपके स्नेह और प्यार को शब्दों में बाँध पाना बहुत मुश्किल है ,
इस समाज से उम्मीद से ज्यादा प्यार मिला है , सभी का दिल से आभार ......
अभी कुछ दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ,

आयोजन श्यामलाल कॉलेज में हुआ , कार्यक्रम इतना अच्छा रहा कि आने वाले कार्यक्रमों का निमंत्रण पहले ही मिल गया,
सभी श्रोताओं ने भरपूर सहयोग किया, हँसते हँसाते कब समय बीत गया कुछ पता ही नहीं चला ,
अभी कुछ रोज़ पहले ही तो घर से निकले थे खाली हाथ, बस अपना जज्बा और माँ पिता, ईश्वर की दुआए साथ थी।
ये आप लोगो का प्यार ही है जिसने प्रभात को प्रभात "परवाना" तक का सफ़र तय करने की हिम्मत दी,

कार्यक्रम की विडिओ लिंक देखने के लिए कई मित्रो के मेल आये, लिंक यू -ट्यूब पर अपलोड कर दी गयी है
आशा है आप सभी को पसंद आएगी




        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


सोमवार, 1 जुलाई 2013

आईने काले हो गए


सच्चाई के आईने, काले हो गए,
बुझदिलो के घर में, उजाले हो गए,
झूठ बाज़ार में, बेख़ौफ़ बिकता रहा,
मैंने सच कहा तो, जान के लाले हो गए.....

लहू बेच बेच कर, जिसने, औलादे पाली,
भूखा सो गया, जब बच्चे कमाने वाले हो गए
.....

लहजा मीठा, मिजाज़ नरम, आँखों में शरम,
सब बदल गया, जब वो शहर वाले हो गए
.....

अपनी कमाई से, एक झोपड़ी ना बना सके,
वो सियासत में आये, तो महल वाले हो गए
.....


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

मंगलवार, 4 जून 2013

सहमी-सहमी....


हैवान बन गया है, इंसान इस कदर
इंसानियत नज़र आती है, सहमी-सहमी,

सन्नाटो से पूछिए, उस रात का मंजर,
हर चीख नज़र आती है, सहमी-सहमी,

निकल पड़े है लोग, बेख़ौफ़ से बनकर
पर भीड़ नज़र आती है, सहमी-सहमी,

गवाहों की आँख में, आहिस्ते से देखिये
हर नजर नज़र आती है, सहमी-सहमी,

सजदो पे बंदिशे, मंदिरों में ताले,
अब अजान नज़र आती है, सहमी-सहमी,

महफूज़ नहीं वो, जो घर से निकल गया,
ये दहलीज़ नज़र आती है, सहमी-सहमी


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com


शुक्रवार, 17 मई 2013

अपनी अलग पहचान रखते हैं.....


दिल में ग़म, लबो पे मुस्कान रखते हैं,
भीड़ में अपनी ,अलग पहचान रखते हैं,

फकीरों के ठाठ, हमने अपना लिए 
पैरो में ज़मीं, सर पर आसमां  रखते है .....

हमारी मुफलिसी खुद्दारी, मार नहीं सकती,
उन्हें बता दो, शौक-ए गुलाम रखते है .....

नए शहर के नए उसूल, समझ नहीं आते,
खामोश रहते हैं, काम से काम रखते हैं.....

शहर के नामचीन भी, अजीब होते हैं
दीन धर्म ईमान, सबके दाम रखते है.....

मुट्ठी भर राख में, सिमटना है एक दिन,
फिर क्यों लोग इतना गुमान रखते है ?.....

इस चका-चौंध में, कहीं भटक ना जायें
इसलिए हम खुदा से, दुआ-सलाम रखते हैं.....

ये गाँव नहीं शहर है, संभलिये, साहब
यहाँ बगल में छुरी, मुहँ में राम रखते हैं .....




        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

मंगलवार, 14 मई 2013

मैकदा बचा लिया ....


आप ही कीजिये, मंदिर मस्जिद में सजदा
हमने मैकदे के पास ही, घर बना लिया .....

औरो से कुछ हटकर, उसूल है हमारा,
जहा मैकदा देखा, वही सर झुका लिया .....


मरीज-ए-इश्क- ने, क्या खूब मर्ज निकाला 
हुस्न को छोड़कर, मय से दिल लगा लिया .....

अंगूर की जवानी से, कुछ यू सजा मैकदा
शेख जी ने मैकदे को, जन्नत बता दिया .....

दंगो की आग में, जल गया शहर सारा
कुछ रिंदो ने मिलकर ,मैकदा बचा लिया .....



        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com



शनिवार, 4 मई 2013

मुझे मैखाने की आदत नहीं

हर साक़ी, हर पैमाने को है,
ये ख़बर, ज़माने को है,
मुझे मैखाने की आदत नहीं,
मेरी आदत, मैख़ाने को है .....

शेख जी आज बिन पिए ही चले गए,
लगता है कोई तूफां, आने को है .....

बस्ती जलाकर जिसने महल बनाया है 
पहला खतरा उसके आशियाने को है .....


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

 

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

प्रेम चतुर्दश स्पेशल ......


आज का प्रेम चतुर्दश त्यौहार (14- फरवरी)


प्रेमिका:-
तुम तोड़ सितारों को, मेरी मांग सजा दो,
अम्बर में लगे चाँद को, धरती पे ला दो,
ये चाँद सितारे, सजन गर दे नहीं पाओ
फूलो पे लदी तितलियों को, घर में तो ला दो 

फूलो पे लदी तितलियों को, घर में तो ला दो 


प्रेमी:-
मैं तोड़ सितारों को, तेरी मांग क्यों भरू?
अम्बर में लगे चाँद को, बर्बाद क्यों करू?
जब तू नहीं मेरी कहो क्यू तेरे प्यार में,
मासूम तितलियों का भला, खून क्यों करू?
मासूम तितलियों का भला, खून क्यों करू?


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com



शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

काश! काश! काश!......

जिस्म तपता रहा रात भर, हक़ीकत की आग से,
और करवटे,
मानो जगह बदल-बदल के
मुझे पूरी तरह सेंकना चाहती थी,

ये जिस्मानी तपन ना थी,
ना ही तन्हाई की तपन,
ये तपिश थी मेरी मजबूरी की, की काश मैं उसे बचा पाता.........


वो तितली जो उड़ना चाहती थी, अपने चटकीले आकर्षक परो से, रौंद दी गयी,
समाज के वहशी के हाथो.....
जो सिर्फ़ उसका कौमार्य पाना चाहता था,

फिर क्या था , एक बार उसके कठोर हाथ तितली के परो को लगे, और
और कठोर हो गये.

तितली का कौमार्य मिट चुका था और वो वहशी खुश था अपनी जीत पर,

तितली के पर उस वहशी के हाथो मे रह गये, और तितली ज़मीन पर असहाय ... पर
वो खुश था जो चाहिए था , मिल गया.....

अब तितली ज़िंदा थी, पुरानी यादो के सहारे उस पराग के सहारे,
जो उसने अभी-अभी पिया था.... तितली को लगा वो उठा लगे उसे, और घर ले चलेगा ,
पर वो चला गया उन तितलियो के पास, जो घर मे क़ैद थी, और सुंदर, और सुंदर......


पर मैं कहा था?????
मैं? मुझे तो बहुत देर से पता चला जब सब ख़त्म हो चुका था,
और मैं कर भी क्या सकता था निरीह बालक की तरह पत्ते से पलटता रहा , उस
तितली को, जो बिना परो के तड़प रही थी .....

अब उस तितली मे सिर्फ़ जिस्म था , जान तो वो ले जा चुका था
पर वो अभी मरी नही थी , ज़िंदा थी मगर लाश की तरह ..........

मैं एक निर्बोध बालक सा रोता रहा, कभी तितली पर, कभी वहशी पर, कभी हालात पर.....

हां वो आता है कभी कभी मुड़कर, उन परो को लेकर जो उसने कभी तोड़े थे, और
हर बार तितली सोचती,
वो उसे लेने आया है,

और इस बहाने कुरेद जाता वो पुराने जख्म, गुबार, तन्हाइया, खामोशिया और
बद-हवासियाँ.........

मैं उस बे-पर तितली को चाहने लगा, उसे ज़िंदा नही, जिंदगी देना चाहता था,

धीरे धीरे उस तितली को मुझसे प्यार हो गया, अब वो कटे पंख से फड़फड़ाने
लगी.... मगर वो डरती थी उड़ने से,
कही वो वहशी फिर.................-.........


यही ज़िंदगी है,
इंसान किस हद तक गिर जाता है, वादा पाने से दफ़नाने का,
और साथ बस पाने से पाने भर तक का.....

अब ज़िंदगी मे हसरते ना रही. बस काश! बचा था ,
काश! खुदा एक मौका और देता, ज़िंदगी के पन्ने पलटने का, एक मौका, ज़िंदगी
दुबारा जीने का

काश! एक मौका, उस भूल को सुधारने का, जो बद-हवासीयो मे होती चली गयी...........

काश! काश! काश!


        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 23 जनवरी 2013

बहाना बता दो...


परियो  सा हुस्न, जागीर में नहीं मिलता 
कहा से पाया है, ये खजाना बता दो ....

ये कमाल के हुनर, ज़रा हम भी सीख ले,
इश्क की नज़र से, दिल जलाना बता दो.....

धरती शितीज या आसमां , हम आ जाएंगे
तुम जहा कही भी हो, ठिकाना बता दो .....

कुछ काम पड़  गया, या मुश्किल में हूँ 
घर क्या कह के निकलू, बहाना बता दो।।।।


        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 1 जनवरी 2013

मान के चलिए ......


 वो बुरा करे, करने दीजिये, 
खुदा ही सजा देगा,  मान के चलिए .....

ख्वाब तोड़िए , ज़मीं पर उतरिये साहब ,
दोस्त ही दगा देगा, मान के चलिए ......

कौन है जो गुल में, खंजर रखता है,
वक़्त सब बता देगा, मान के चलिए ......

तेरे बलिदान उसे, बुलंदी पर ले गए बेशक,
वो सब भुला देगा, मान के चलिए ......

माँ बाप को ठोकरे खिला  रहा है जो अब तलक 
तुझे क्या सिला देगा, मान के चलिए ......

        कवि प्रभात "परवाना"
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रविवार, 2 दिसंबर 2012

अच्छा नहीं होता .......



ये शीशे के दिल है नज़ाकत से रखिये ,
कांच दरक जाए तो अच्छा नहीं होता .............

मंजिल पानी है बेशक मगर हद्दो में रहकर
जूनून हद्द से बढ़ जाए तो अच्छा नहीं होता .........


कहानी किस्से किताबो से हटकर सोचिये
चाँद ज़मीं पर उतर आये तो अच्छा नहीं होता .......

शौक से पीजिये मगर ख्याल रखिये
कदम लडखडाये तो अच्छा नहीं होता ................


        कवि प्रभात "परवाना"
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शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

मौत से लड़ती रही.......


मौत से लड़ती रही,
जूझती रही,
बिखरती रही,.

और इस तरह .
.
.
.
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जिंदगी निखरती रही।

        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

वो आसमान में सफ़र करने लगा है....



          वो आसमान में सफ़र करने  लगा है
 ज़रा पर क्या निकले, ज़मीं से नफरत करने लगा है,

खुद की तबाही का कितना शौक है उसे,
दिल-लगी छोड़ के मोहब्बत करने लगा है।


        कवि प्रभात "परवाना"
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