रविवार, 9 अक्टूबर 2011

जीता हूँ जंग जब से, सब जानने लगे है....

जीता हूँ जंग जबसे, सब जानने लगे है,
कल तक थे जो पराये, अपना मानने लगे है...........

बहता था जो पसीना, वरदान मैंने माना,
मेहनत को ही सदा से भगवान् मैंने मैंने,
बढता रहा मै पथ पर ,पर आस के लगाकर
बैठे थे राह में कुछ, ताश से बिछाकर

पथ चिन्ह मेरे पथ, परिजन छानने लगे है,
जीता हूँ जंग जबसे, सब जानने लगे है..

राहे बहुत कठिन थी मै मानता था लेकिन,
कुछ करके ही रहूँगा मै जानता था लेकिन
आज पा लिया है उसको जो दूर था चमन में
अब थक गया हूँ यारो, शरण तो अमन में

अनजान कल के चेहरे पहचानने लगे है
जीता हूँ जंग जबसे, सब जानने लगे है,

कल तक थे जो पराये, अपना मानने लगे है...........
जीता हूँ जंग जबसे, सब जानने लगे है ..........

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"




जीवन में रंग भर दो

जीवन में रंग भर दो, आँखों के तूल से तुम,
गम दिल के सब मिटा दो, हँसी के फूल से तुम

हारा था जिंदगी से, बस तुम ही एक किरण हो,
ना चाहिए विरासत, एक तुम ही मेरा धन हो
             दुनिया मेरी बसा दो, चरणों की धूल से तुम
           जीवन में रंग भर दो, आँखों के तूल से तुम,

हो तुम ही मेरी देवी, हो तुम ही मेरा जीवन
तुम्हारी खातिर कर दू, मै अपना सब कुछ अर्पण
                     कमियाँ मेरी भुला दो,जी खुद की भूल से तुम
                    जीवन में रंग भर दो, आँखों के तूल से तुम,

जीवन में रंग भर दो, आँखों के तूल से तुम,
गम दिल के सब मिटा दो, हँसी के फूल से तुम

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"




शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

कोई जिंदगी थी, जो अब नहीं बची थी...

शहर से थोड़ी दूर मेरा आशियाना था, किसी काम से मुझे नजदीक बस्ती में जाना था.
अनजान से डर से मै डर रहा था, भीड़ भाड़ वाली सड़क पार कर रहा था
जाने कहा लोग भाग रहा थे, आधे सोये सोये थे, आधे जाग रहे थे
कुछ किसी अजीब भ्रम में पल रहे थे, कुछ अभी नए साँचो में ढल रहे थे,
सब के हाव भाव पढ़ रहा था, चलते चलते रेलवे फाटक पार रहा था.
यहाँ चीत्कार मचा थी, हाहाकार मची थी,
शायद कोई जिंदगी थी, जो अब नहीं बची थी,
कुछ आँख फेरे थे, कुछ देखकर अनदेखे थे
बीस तीस छड़े थे, जो पास खड़े थे
दो चार औरते, जोर जोर से चीख रही थी,
देख कर पटरी बार बार, आँखे मीच रही थी
मेरे बस्ती जाने की याद घुटती गयी
मै स्तब्ध खड़ा रहा, वहा भीड़ जुटती गयी,
पास आया पटरी के कुछ कदम चलकर
रुका और गुस्साया लोगो की बात सुनकर
लोगो में चर्चा थी, ये हिन्दू है मुसलमान है,
कोई कहता सिख कोई पठान है,
मै गया पटरी पर, निहारता रहा एक टक
कोई 20 -22 का रहा होगा, रेल की चपेट में आ गया होगा
लगभग आधा शरीर ही बचा था,आधा रेल के साथ ही जा चुका था
कुछ निरिक्षण के बाद मुह खोला, था मै गुस्साया पर शान्ति से बोला
अरे ये जो मौन है, मै जानता हूँ कौन है
अरे समाज के ठेकेदारों, ये मेरा धक्के खाता, पैदल चलता,
कभी ऊपर कभी नीचे वालो का सताया हुआ,
रोटी कम, गम ज्यादा खाया हुआ हिन्दुतान है,
और रही बात धर्म की, तो ये ना हिन्दू है ना मुसलमान है ,
ना सिख है ना पठान है, अरे ध्यान से देखो
ये हुबहू वैसा ही है जैसा कोई और इंसान है
जैसा कोई और इंसान है, जैसा कोई और इंसान है,

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"





सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

इबादत की इजाजत दे दो

आज भी जहन में महफूस है तेरी तरकश के तीर,
तेरी हर नापाक हरकत से निगाहों से बही है पीड़
क्या तालीम तेरी तुझको बना बैठी है आज
तेरे बेशुमार मकानों में, एक नहीं है नीड़

हुस्न की महफ़िल में जिनका बोलबाला मिला
तसल्ली से परखा, तो दिल काला मिला
और तन्हा नाजुक से, होठो को सी के बैठे थे जो,
इस प्रभात की अँधेरी जिंदगी को उन्ही से उजाला मिला...



खुदा खुद दफ़न की कगार पर है.क्या?
क्यों चाँद जल रहा है सूरज से तेज आज.....

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"




मेरी वो कसम वफ़ा की टूट जाएगी.....

तू हमसफ़र बनी तो तन्हाई रूठ जाएगी 
मेरी वो कसम वफ़ा की टूट जाएगी
जिस कलाई को थाम सालो बैठा रहा
वो कलाई तन्हाई की छूट जाएगी

देखो कितनी खुश है वो मेरे आगोश में
बिछड़  के मुझसे, गमो  में डूब जाएगी

गश्त खा कर गिर गया ये सोच परवाना
बेचारी जिंदगी से लगभग ऊब जाएगी

तू हमसफ़र बनी तो तन्हाई रूठ जाएगी 
मेरी वो कसम वफ़ा की टूट जाएगी.....

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"




रविवार, 2 अक्टूबर 2011

कभी फुर्सत में बैठोगे तो बताऊंगा........

कभी फुर्सत में बैठोगे  तो बताऊंगा........
तुम्हारे ख्वाब की लड़ियो में कैसे रात कटती है.....
कभी जो फेर ली आँखे तो मर जाऊँगा
तुम्हारे ख्वाब की लड़ियो में कैसे आँख बहतीं  हैं .........

मै जो हूँ अब तलक जिन्दा मेहरबानी  है
दिलो को काटने वाली, वो बाते रात कहती है
कभी फुर्सत में बैठोगे  तो बताऊंगा........
तुम्हारे ख्वाब की लड़ियो में कैसे रात कटती है.....

मेरे सीने में भी दिल है कसम खाने को
कोई हो ना हो यारो, जुदाई साथ रहती है 
कभी फुर्सत में बैठोगे  तो बताऊंगा........
तुम्हारे ख्वाब की लड़ियो में कैसे रात कटती है.....

प्रभात कुमार भारद्वाज "परवाना"




सोमवार, 19 सितंबर 2011

चाँद पर्दा हटा...



रातो को अक्सर सोचता हू, बालो को अक्सर नोचता हू
क्या नाम दू, क्या नाम दू, इस रिश्ते को मैं  सोचता हू

ओ जाना हुई क्या खता , जरा हमें भी बता
ओ जाना हुई क्या खता जरा हमें भी बता
सब हार दू, सब हार दू,मै तेरे सदके वार दू
मुझे  ऐसे ना सता, ओ जाना हुई क्या खता

चलता अक्सर सपनो में,ढूढू  तुझको अपनों में
मेरी जान तू, पहचान तू,मेरा धर्म तू ईमान तू
चाँद पर्दा हटा,ओ जाना हुई क्या खता......

चंदा की चादनी तू,सूरज की रौशनी तू,
तू झरनों का पानी है, रागों की रागनी तू 
तू दूर है है तू नूर है,दिलवालों में मशहूर है
कभी तो  नजरे मिला, ओ जाना हुई क्या खता.
ओ जाना हुई क्या खता , जरा हमें भी बता

रातो को अक्सर सोचता हू, बालो को अक्सर नोचता हू
क्या नाम दू, क्या नाम दू, इस रिश्ते को मैं  सोचता हू...........

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना" 



मेरी सहेली बन जा ऐ जिंदगी,



मेरी सहेली बन जा  ऐ जिंदगी,
कभी तो करीब आजा ऐ जिंदगी
कभी तो नज़र मिला जा ऐ  जिंदगी.
ऐ जिंदगी ऐ जिंदगी ऐ जिंदगी............

मेरे गमो में कभी सावन सी रो दे तू
मेरे जीवन में कभी ख़ुशी बीज बोदे तू
मेरे नैनो को भीगा जा ऐ जिंदगी
ऐ जिंदगी ऐ जिंदगी ऐ जिंदगी........

कभी रूठ मुझसे कभी मै मनाऊ
जो तू हो संग मेरे बस मै चलता जाऊ
मेरी हर खता भुला जा ऐ जिंदगी 
ऐ जिंदगी ऐ जिंदगी ऐ जिंदगी......

मेरी सहेली बन जा  ऐ जिंदगी, मेरी सहेली बन जा  ऐ जिंदगी,

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


मंगलवार, 6 सितंबर 2011

मेरी मौत को ढकेलटी है ज़िंदगी..........

मुझसे क्यों खेलती है जिंदगी?
क्या मुझे झेलती है जिंदगी?
सच कहू मुझको लगता है
मेरी मौत को ढकेलटी है ज़िंदगी


नन्हे कदम, जग नया नये रिश्ते
सांचो मे ढलते हम, हम से बदलते रिश्ते
दूर के रिश्ते पास के रिश्ते
रिश्तो मे उलझकर निकलते से रिश्ते


क्या बस रिश्तो को समेटती है ज़िंदगी..
सच कहू मुझको लगता है
मेरी मौत को ढकेलटी है ज़िंदगी



रोती  खुशी, हसती खुशी, चिल्लती खुशी, बलखाती खुशी
बाहो मे भरकर, गले से लिपटकर
अपनो का अहसास कराती खुशी


फिर आँख मिचौली क्यू खुशी से खेलती है ज़िंदगी?
सच कहू मुझको लगता है
मेरी मौत को ढकेलटी है ज़िंदगी




आनी मौत बचकानी मौत,शमशानी मौत, अंजानी मौत पहचानी मौत
मौत से लड़ते लड़ते एक दिन आ जानी मौत
बहुत खुशनसीब होते है है वो नसीब वाले
जिन्हे नसीब होती है रूहानी  मौत


हर चौराहे पर है मौत खड़ी, बस उसे ठेलती  है ज़िंदगी?
सच कहू मुझको लगता है,,मेरी मौत को ढकेलटी है ज़िंदगी
सच कहू मुझको लगता है...मेरी मौत को ढकेलटी है ज़िंदगी..........


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


"प्रभात" का उजाला है आज



दरिया दिल मे, पत्थर सा ख्वाब डाला है आज,,
जीत को पाया, हार को हरा डाला है आज,
हस रहे थे जो, निशा से जब डरा था मैं
खबर दो कोई उन्हे, "प्रभात" का उजाला है आज


पहला वास्ता मासूम का, परछाईयो से था,
नन्हे थे कदम और चढ़ना, उचाईयो पे था
माना की मावस की रातो मे, डर गया था मैं
क्यूकी चाँद सा मैं रहता, तन्हाइयो मे था


लड़ कर हालात से, क्या कर डाला है आज
जीत को पाया, हार को हरा डाला है आज,
हस रहे थे जो निशा से, जब डरा था मैं
खबर दो कोई उन्हे, "प्रभात" का उजाला है आज
खबर दो कोई उन्हे, "प्रभात" का उजाला है आज


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"