शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

मै मर गया हूँ वो आये नहीं है...



गम नहीं ये की मै मर गया हूँ , गम यही की वो आये नहीं है,
बागो में किये थे जो वादे, उसने अब तक निभाए नहीं है,
गम नहीं ये की मै मर गया हूँ , गम यही की वो आये नहीं है,


जालिम दुनिया जलाने से पहले, कोई उनको यहाँ पर बुला लो,
मेरी आँखे खुली छोड़ देना, उनसे नजरे मेरी तो मिला दो,
यकीं है की वो आएँगे, अपने है पराये नहीं है...
गम नहीं ये की मै मर गया हूँ , गम यही की वो आये नहीं है,


कुछ निशा रह गए थे जो बाकी, कोई उनको छुपा कर मिटा दो,
मेरी मय्यत उठे उससे पहले, उनको मेरे गले से लगा दो
वो जो ख़त तुने मुझे लिखे थे, मैंने अब तक जलाये नहीं है,
गम नहीं ये की मै मर गया हूँ , गम यही की वो आये नहीं है,


न मरूँगा मै ना ही जलूँगा जब तक तेरा सहारा ना होगा,
ना ही रूह को आजादी मिलेगी ना ही जन्म दुबारा होगा,
इन राहो पर रखो कदम जी, मैंने कांटे बिछाये नहीं है
गम नहीं ये की मै मर गया हूँ , गम यही की वो आये नहीं है
बागो में किये थे जो वादे, उसने अब तक निभाए नहीं है..............


प्रभात कुमार भारद्वाज "परवाना"


गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

साकी ही बैसाखी छीने तो मै क्या करू?

जी बहुत बड़ा हूँ मै,
पर सच कहू तो लंगड़ा हूँ मै ,
सच्चाई को देखकर
शर्म से गड़ा हूँ मै


एक साकी पर ही विश्वास था,
बस वो ही मेरी आस था,
होंगे हुज़ूर आप दौलत वाले
और क्या मेरे पास था
विश्वास का नाम भी धोखा निकला हाय क्या करू?
साकी ही बैसाखी छीने तो मै क्या करू?


धोखे की रोटी खाता हूँ,
गम की सब्जी ही पाता हूँ,
अश्को को पी जाता हूँ
जब मैखाने जाता हूँ,
नाम लेके साकी का अधरों पर पैमाना रखू?
पर साकी ही बैसाखी छीने तो मै क्या करू?


हालातो ने मशहूर किया है,
कुछ कहने पर मजबूर किया है,
बस आसू से रिश्ता मेरा
खुशी ने मुझको दूर किया है,
इतना मर मर  की जिया हूँ अब और कितना मरू?
पर साकी ही बैसाखी छीने तो मै क्या करू?


झूठ नहीं जानता, इसलिए लंगड़ा हूँ
छल नहीं मानता, इसलिए लंगड़ा हूँ
सीना नहीं तानता, इसलिए लंगड़ा हूँ,
ये दुनिया कुछ कहे मुझे फर्क नहीं
अगर साफ़ रहना, साफ़ कहना, जुल्म ना सहना 
लंगड़ापन है तो मै लंगड़ा ही सही
तो मै लंगड़ा ही सही..........


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"



बुधवार, 27 अप्रैल 2011

अपनों के मायने बदलने लगे है.......


चढ़ा मै तो सूरज भी ढलने लगे है
मेरी तर्रकी से जलने लगे है 
बुला लेता अपनों को इस खुशी में,
पर अपनों के मायने बदलने लगे है,
उठ उठ के अक्सर सोते है वो,
आँखों को पानी से धोते है वो,
यकीं नहीं उन्हें इस पल पर,
आहे भर भर के रोते है वो,
बिम्ब निहारते है अक्सर पर,
शिरकत-ए-आईने बदलने लगे है,
बुला लेता अपनों को इस खुशी में
पर अपनों के मायने बदलने लगे है,
बहुत कोशिशे हराने की की 
बहुत कोशिशे लड़ाने की की
काटे बिछाए उन्होंने जब जब मैंने
कोशिशे कदम बढाने की की
कदम मेरे खू से सने देख कर 
दुश्मन तक आँखे मलने लगे है,
बुला लेता अपनों को इस खुशी में
पर अपनों के मायने बदलने लगे है,
जी सही कहा गुनेहगार हूँ मै 
जल्दी है आपको इन्तजार हूँ मै,
बस अब खामोशी का इम्तहान ना लो
बोल उठा तो फिर ललकार हूँ मै,
रवैया मेरा कड़ा देखकर,
साजिशो को अपनी धरा देखकर 
हद्द है वो संग मेरे चलने लगे है,
बुला लेता अपनों को इस खुशी में
पर अपनों के मायने बदलने लगे है
बुला लेता अपनों को इस खुशी में
पर अपनों के मायने बदलने लगे है...


प्रभात कुमार भारद्वाज "परवाना"



सोमवार, 25 अप्रैल 2011

तुम फूलो में हो तुम सावन में हो...

तुम फूलो में हो तुम सावन में हो,
मेरे दिल का बगीचा सारा ही खाली, नाचती मोरनी सी आँगन में हो,
तुम फूलो में हो तुम सावन में हो,
आज कान्हा गए है बरसाने राधे ,
पता ये चला है,तुम वृन्दावन में हो,
तुम फूलो में हो तुम सावन में हो
तुम धरा की हो देवी हो नभ की हवा
तुम समंदर में हो आग पावन में हो
तुम फूलो में हो, तुम सावन में हो
क्यों ना आये ये दिल अब उसी चाँद पर,
वो चाँद वो तारे जिसके दामन में हो
तुम फूलो में हो, तुम सावन में हो
मेरे दिल का बगीचा सारा ही खाली, नाचती मोरनी सी आँगन में हो,
तुम फूलो में हो, तुम सावन में हो


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


वो जलाते रहे और मै जलता रहा


वो जलाते रहे और मै जलता रहा
सिलसिला ना थमा यू ही चलता रहा
फ़ना कर खुशी मैंने दुःख को चुना,
कोई तो मेरा बता दो गुनाह 
वो लुटाते रहे और मै लुटता रहा
वो जलाते रहे और मै जलता रहा
यू तो मेरे भी दीवाने थे
मै था शम्मा जी मेरे भी परवाने थे
जी जले थे सभी मेरे आगोश में,
पर रहा था खामोश तेरे होश में,
राहे थी गलत पर मै चलता रहा
वो जलाते रहे और मै जलता रहा
अब तो वीरानियो से हुई है सुलह,
हाथ थमा है सारी बाते भुला
आज न कोई आओ मेरी राह में,
मरना है आज जालिम तेरी बाह में,
सब फिसलता रहा हाथ मलता रहा,
वो जलाते रहे और मै जलता रहा
वो जलाते रहे और मै जलता रहा......


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना" 



आपकी कसम......

पर नहीं है पर परिंदा हूँ मै
हालातो पर शर्मिंदा हूँ मै,
मेरा हाजमा देख कर हैरान है दुनिया
इतने गम खा कर भी जिन्दा हूँ मै


दिल जिनका नर्म और दिमाग सादा था,
जिनसे उम्र भर साथ निभाने का वादा था
आज वे ही गुमराह कर बैठे है मुझे 
जिन पर विश्वास मुझे खुद से ज्यादा था 



आईने भी इजहार करने लगे है,
छुप छुप के दीदार करने लगे है,
मेरी तस्वीरे उनकी किताबो से मिली है,
सबूत है, वो प्यार करने लगे है 


इस कदर उड़ गया उनके होश में,
याद करके पल आ जाता हूँ जोश में
वो और मै झूले पर, माहौल देखिए
मै उनके और वो मेरे आगोश में 




दुनिया के लिए प्यार एक मजा है,
आशिक के लिए प्यार एक सजा है,
होगा अंधेरो को गिला प्यार से
क्युकी "प्रभात" के लिए प्यार एक नशा है 

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


शनिवार, 23 अप्रैल 2011

उसने कभी प्यार किया था.....


चांदनी रात में मैंने इजहार किया था,
आँखे ततेरी उसने फिर इनकार किया था,
उसकी बेवफाई ही सबूत बनी है दोस्तों,
की हाँ उसने मुझसे कभी प्यार किया था......
ये जो इश्क का रोग है ,सब उसका ही दोष है 
दर्द-ए-दिल देके मुझे बीमार किया था 
उसकी बेवफाई ही सबूत बनी है दोस्तों,
की हाँ उसने मुझसे कभी प्यार किया था....
दिल को खिलौना जान कर, बस एक मजाक मान कर 
तोडा, मरोड़ा और फिर उसे तार तार किया था 
उसकी बेवफाई ही सबूत बनी है दोस्तों,
की हाँ उसने मुझसे कभी प्यार किया था.....
क्यों लिखे ख़त मुझे खून वाले उसने 
गम के समंदर में भी सुकून वाले उसने 
नाम लिख हथेली पर मेरा क्यों इख्तियार किया था
उसकी बेवफाई ही सबूत बनी है दोस्तों,
की हाँ उसने मुझसे कभी प्यार किया था...............


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"





मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

ज्यादा नहीं कहता बस...

मैं हिमालय, गम की सेना बढ़ रही थी,
फिर काफिर की नजर मेरी मंजिल को तड़ रही थी,
मेल खुदा का देखो हुजूर,इधर मैं पत्थर हो रहा था,
उधर किस्मत में ठोकर बढ़ रही थी

हाँ हाँ मैं बोल रहा हूँ मगर खामोश हूँ मैं,
हाँ हाँ मैं चल रहा हूँ मगर बेहोश हूँ मैं
दर्द, गम बेवफाई क्या क्या दे गई और मैं कुछ भी ना दे सका
कितना एहसानफरामोश हूँ मैं, कितना एहसानफरामोश हूँ मैं

मेरे होठो को छु लिया आज फिर उसने ये कह के की तेरी इस याद के सहारे जिंदगी काट लूँगा.....
और अगर तू दूर हुई मुझसे एक पल को भी तो ये जिस्म तेरे नाम से मंदिरों में बाट दूंगा...............

आज फिर किसी गम ने ललकारा है मुझे,
जीतने की चाह में फिर हारा है मुझे
मारा होगा दुनिया ने मजनू को पत्थरों से
इस जमाने ने फूलो से मारा है मुझे.....

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"




रविवार, 17 अप्रैल 2011

उनसे सपने में मुलाकात हुई......



कल फिर उनसे सपने में मुलाकात हुई,
खुदा की महर हुई की उनसे बात हुई,
"आप कैसे हो" ये कहा मैंने और फिर इस तरह शुरुवात हुई,
मुख चंदा, बिदिया तारा, नैन झील पे सब वारा
केश वर्ण की बात कहू क्या, लगता जैसे रात हुई,
कल रात उनसे मुलाकात हुई,
मेघ पलक चल दूर तलक, कर सैर फलक,
मद्धम मद्धम सी खोल पलक मोती की बरसात हुई,
कल रात उनसे मुलाक़ात हुई,
कोमल अधर, बेचैन कर, हो ना सबर
क्या गढ़ा है तुमको खूब खुदा ने, उसकी मेहनत की दाद हुई 
कल रात उनसे मुलाकात हुई,
तुमको सागर मैं कह देता पर सागर तो चुल्लू लगता था,
तुमको अम्बर मैं कह देता पर अम्बर तो उल्लू लगता था
कुदरत-की बक्शीश कहू या  कुदरत की करामात हुई
कल रात उनसे मुलाकात हुई 
खुदा की महर हुई की उनसे बात हुई 


प्रभात कुमार भारद्वाज "परवाना"



शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

एक रात उठ उठ कर रोया..........



एक रात उठ उठ कर रोया अपनी कहानी पे,
कभी दिल के दर्द पे, कभी आँखों के पानी पे,
लात मार कर मेरे बचपन को कुचल दिया जिसने,
सुबक सुबक कर रोया मै उस जवानी पे .......
घर से निकला दूर तलक ठंडी फिजा में
"प्रभात" को पुकारती एक अनकही दिशा में,
सोचा आज एक पत्ते पर लिखू अपनी कहानी,
पर पतझड़ के मौसम में, पीले पत्ते तक हवा बहा ले गयी,
और फिर सर पीट पीट कर रोया, मै अपनी इस भोली नादानी पे
एक रात उठ उठ कर रोया मै अपनी कहानी पे,
लात मार कर मेरे बचपन को कुचल दिया जिसने,
सुबक सुबक कर रोया मै उस जवानी पे
सुबक सुबक कर रोया मै उस जवानी पे .......


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"