सोमवार, 5 मार्च 2012

कायनात छोटी पड़ गयी......


जमीन से लेकर आसमां तक निकलता गया आदमी,
जितना चढ़ा उतना ही फिसलता गया आदमी
कायनात छोटी पड़ गयी हवस के सामने
जितना मिला उतना ही निगलता गया आदमी

महलों को शातिरी से उसने जोड़ तो लिया
पर हाय! मोम सा पिघलता गया आदमी


गीदड़ की जात शेरो पर गरजती है जनाब
हैवानियत आसमान से बरसती है जनाब
आबाद है महल हर जालिम के "प्रभात"
आदमियत आशियाने को तरसती है जनाब

                                       कवि प्रभात "परवाना"
वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/ 





रविवार, 4 मार्च 2012

एक छोटी सी कोशिश..........


आज इस ब्लॉग के इतिहास में बहुत बड़ा दिन है, आज इस ब्लॉग में एक ऐसी पोस्ट को जोड़ा गया है जो आजतक की पोस्ट में से बहुत अलग है, ये एक इसी विडियो क्लिप है जिसमे मेरे द्वारे एक छोटी सी कोशिश की गयी है आज के एलेक्शन के सच को दर्शाने की, आज के भ्रष्ट नेताओं के दिल की बात, बच्चा बच्चा जानता है देश की वास्तविक स्थिति क्या है, पर जब यही बात एक कवि कहता है तो समा देखेने लायक होता है, इस क्लिप को देखे, अगर पसंद आये तो शेयर भी करे अपने फेसबुक पर, ट्विट्टर पर, ऑरकुट पर , जहा भी चाहे, लोगो से बाटे, विश्वास करता हूँ आपका प्रोत्साहन मिलेगा मेरी इस छोटी सी कोशिश को...............


तड़प रहा है गुलशन.......


तड़प रहा है गुलशन, अब्र की तलाश में,
जैसे कफस पड़ा हो, कब्र की तलाश में,

एक छोटी सी खता ने असीर बना डाला
भटकता रहा मैं अब तक, जब्र की तलाश में

जल गयी जिंदगानी, खाने-ओ-कमाने में,
चल पड़ा हूँ अब मैं, सब्र की तलाश में..........

शब्दार्थ: अब्र:-बादल, कफस:-शरीर, असीर:-कैदी, जब्र:-कठनाइयां

-------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"







बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

बोतल "जी" लगा के बोलिए

जब दर्द भरा हो सीने में,
मजा ना आये जीने
में,
चल साखी मैखाने में,
और देख मजा फिर पीने में....

जन्नत को ले जाएगी, बोतल "जी" लगा के बोलिए,
कमसिन है यौवन रसधारा, आहिस्ता से खोलिए

नुक्ताचीनी कर गैरो की, क्यों खुद पर इठलाते हो,
वक़्त बड़ा है धोखे वाला, अपनों को भी तोलिये

जन्नत को ले जाएगी, बोतल "जी" लगा के बोलिए,

अब आप गवाही क्या दोगे, अपने नापाक इरादों की,
जहर भरा है नजरो में, अब लब से कुछ ना बोलिए,

जन्नत को ले जाएगी, बोतल "जी" लगा के बोलिए,

कुछ मैं की खातिर जीते है, कुछ मय की खातिर मरते है,
छोड़ पराई दुनियादारी, हम इस मय के हो लिए

जन्नत को ले जाएगी, बोतल "जी" लगा के बोलिए,



                                       कवि प्रभात "परवाना"
वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/ 



मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

दिल पर गुजरती है, तो लिख लेता हूँ


मेरी शराफत के चर्चे, ज़माना नहीं जानता
मैं इतना शरीफ हूँ, मैखाना नहीं जानता
दिल पर गुजरती है, तो लिख लेता हूँ हुजूर,
मैं गीत और ग़ज़ल का, पैमाना नहीं जानता .......

मुझसे कोई उम्मीद-ए-चापलूसी ना रखे,
मैं साफ़ कहता हूँ, बडबडाना नहीं जानता........

मेरी शोहरत मैंने नंगे पैरो से कमाई है
मैं बेवजह पैसा उड़ाना नहीं जानता .........

जब कह दिया परवाना तो क्यों हटू बोलो,
मैं मरने के डर से शंमा बुझाना नहीं जानता.......

दिल पर गुजरती है, तो लिख लेता हूँ हुजूर,
मैं गीत और ग़ज़ल का, पैमाना नहीं जानता ......

---------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

गर मिल जाती मधुबाला


(ये कोई कविता नहीं ये एक तुकबंदी है, आशा है आपको पसंन्द आएगी, ये सिर्फ उनके लिए है जो मधुबाला को प्यार करते है उन्हें चाहते है..) 

पी लेता विष की हाला
सह लेता भीषण ज्वाला
हाँ कह देता हर ग़म को,
गर मिल जाती मधुबाला

नाजो से है माँ ने पाला
घर है मेरा मधुशाला
तुम भी मेरे जैसे हो
एक बार कहो ना मधुबाला

दुनिया तो है सदा पराई
दुनिया ने है क्या कर डाला
करवट में है रात बिताई
एक बार आओ ना मधुबाला

छु लो लब का अमृत  प्याला
सदियो से है प्यार हमारा
गुमसुम करने में भी हाँ
एक आह भरो ना मधुबाला

---------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

पूछा उसने दिल में क्या है....


लो आग बरसी है बादलो से तमाशा तो होगा
वो हाल पूछती है पागलो से तमाशा तो होगा

जो पूछा हाल ए दिल उसने
बस चेहरा अपना दिखा दिया----------अब और बताओ क्या कहता

पूछा गुमसुम क्यों रहते हो,
पहरा अपना दिखा दिया------------अब और बताओ क्या कहता

जो पूछा क्या खाकर आये हो,
जख्म गहरा अपना दिखा दिया---------अब और बताओ क्या कहता

पूछा उसने दिल में क्या है,
सेहरा अपना दिखा दिया---------अब और बताओ क्या कहता


------------------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"




मंगलवार, 10 जनवरी 2012

अपनों के किरदार बदलते देखे है......


एक छोटी सी बात पर परिवार बदलते देखे है,
जरुरत पड़ी तो सब रिश्तेदार बदलते देखे है,
यकीन सा उठ चला हर शख्स से "प्रभात"
मैंने अक्सर अपनों के किरदार बदलते देखे है......

जितना दिया खुदा ने, उतनी हवस बढ़ी
आये दिन लोगो के व्यापार बदलते देखे है.....

कल खबरों में छा  जाना था, तेरे नापाक इरादों को 
कुछ गड्डी दे के नोटों की, अखबार बदलते देखे है......

लो आ गए वो भी मेरी बदनाम महफ़िल में,
अरे हमने बड़े बड़े इज्जतदार बदलते देखे है.......

किस सरगम-ऐ-सांस पर जीवन दे "परवाना "
दो दो कौड़ी की खातिर फनकार बदलते देखे है.......

--------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज "परवाना"


गुरुवार, 5 जनवरी 2012

जब सोता है ज़माना..........


जब सोता है ज़माना खुद से बेखबर होकर,
फिर जाग पड़ता हूँ मैं कुछ बेसबर होकर....

मेरे लब्जो का मेरे राज़ से मिलन,
मेरी खामोशी का रात से मिलन,
और कल का आज से मिलन....

कागज़ का कलम से इश्क होता है,
मेरी आसू मेरी पलकों से मिलते है.

और सबसे बड़ी बात

मैं अपनी तन्हाई को पूरा समय दे पाता हूँ,
दिन भर के किरदार को उतार फेंक खुद से मिलता हूँ,
जाने कितने नकाब मेरे वजन बढ़ा रहे थे,
कही दूर रखे जाते है...........

गले लगाकर रोता हूँ तन्हाई को,
और कभी कभी तो सिसक सिसक कर,
आंसू गला रौंध देते है,
अल्फाजो की कोई जगह नहीं बचती,

खूब मिलन के बाद हल्की हल्की आँखे अब भारी होने लगती है,
और निद्रा मुझे अपने आगोश में जकड़ लेती है,

रह जाते है वो नकाब एक नयी सुबह की तलाश में,
कल फिर एक नया किरदार ओढ़ मुझे दुनिया से लड़ने निकलना जो है.........

जब सोता है ज़माना खुद से बेखबर होकर,
फिर जाग पड़ता हूँ मैं कुछ बेसबर होकर....

-----------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


एक नकाब ओढ़ आ रहा है कोई.........


नजरे झुकी है, और गुलाब, ला रहा है कोई,
एक नकाब ओढ़ फिर, आ रहा है कोई.........

नैनो में तीर, होठो पे हँसी, भीगी खुली जुल्फे,
बेवजह क्यों जुल्म, ढा रहा है कोई......
एक नकाब ओढ़ फिर, आ रहा है कोई..........

कई रात नहीं सोया, एक ख्व़ाब का असर है,
मासूम बन फिर सपना, सजा रहा है कोई......
एक नकाब ओढ़ फिर, आ रहा है कोई.......

गरीब था मैं पहले, अब फ़कीर हो गया हूँ,
मुझे लूट इस तरह, क्या पा रहा है कोई.......
एक नकाब ओढ़ फिर, आ रहा है कोई............

मेरे हालात अब दुआओं के, काबिल ना रहे,
और अब जाकर तरस, खा रहा है कोई......
एक नकाब ओढ़ फिर, आ रहा है कोई..........

नजरे झुकी है, और गुलाब, ला रहा है कोई,
एक नकाब ओढ़ फिर, आ रहा है कोई.........

-----------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"