शनिवार, 4 मई 2013

मुझे मैखाने की आदत नहीं

हर साक़ी, हर पैमाने को है,
ये ख़बर, ज़माने को है,
मुझे मैखाने की आदत नहीं,
मेरी आदत, मैख़ाने को है .....

शेख जी आज बिन पिए ही चले गए,
लगता है कोई तूफां, आने को है .....

बस्ती जलाकर जिसने महल बनाया है 
पहला खतरा उसके आशियाने को है .....


        कवि प्रभात "परवाना"
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गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

आईने से नज़रे मिला लीजिये .......


आँखों में नमी, दिल परेशां क्यों है,
मैं सब बता दूंगा, दो घूँट पिला दीजिये.......

और नशा शराब का यकीनन बढेगा,
इसमें अश्क मेरे, मिला दीजिये.......

गलती इंसान से नहीं तो क्या खुद से होगी,
क्यू खामखा, किसी से गिला कीजिये.......

खुद से मोहब्बत, आपको हो जाएगी
आईने से नज़रे, मिला लीजिये .......



        कवि प्रभात "परवाना"
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रविवार, 31 मार्च 2013

माँ ....


रिश्तेदारी जब, गर्त में ले जाती है
तब कही जाकर, माँ याद आती है,
दौर-ए-मुसीबत का मर्ज, खूब जानती है,
माँ बाज़ार जाकर, जेवर बेच आती है.......

हालातो से लड़ने का, हुनर देखिये
माँ अँधेरे में, दिया ढूंढ लाती है.......



        कवि प्रभात "परवाना"
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शनिवार, 30 मार्च 2013

मीर और ग़ालिब का ज़माना नहीं रहा........


सच्चे प्यार का अब, फ़साना नहीं रहा,
शमा में जल गया, परवाना नहीं रहा
शायरी रूह तक पहुचे, तो कैसे पहुचे
अब मीर और ग़ालिब का, ज़माना नहीं रहा........

सियासत और हवस ने, पूरा शहर खोद डाला
अब ज़मीं के नीचे छिपा हुआ, खज़ाना नहीं रहा
........

सच और नेकी की राह में, ये मोड़ भी आया
खाने को रोटी और रहने का, ठिकाना नहीं रहा
........

इश्क उनसे हुआ तो, हम जीते जी मर गए,
अब मौत के आने का, बहाना नही रहा
........

        कवि प्रभात "परवाना"
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शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

थोड़ा इन्तजार कीजिये .....


हमसे कितना दूर जाएंगे,
हमें पता है, वो लौट आएँगे, थोड़ा इन्तजार कीजिये .....

ये हया का पर्दा है, धीरे धीरे हटेगा,
वो नज़र मिलाएंगे ,थोड़ा इन्तजार कीजिये .....

मैं गिरू, तो मेरा हाथ थाम लेना,
तुम्हे मोहब्बत के वादे याद आएँगे, थोड़ा इन्तजार कीजिये .....

कई रोज़ बाद मिला, तो आँख भर आई ,
हम भी मुस्कुराएंगे , थोड़ा इन्तजार कीजिये .....

उन्हें देखकर हमने बहुत कुछ लिख डाला ,
कभी और सुनाएंगे , थोड़ा इन्तजार कीजिये .....




        कवि प्रभात "परवाना"
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शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

प्रेम चतुर्दश स्पेशल ......


आज का प्रेम चतुर्दश त्यौहार (14- फरवरी)


प्रेमिका:-
तुम तोड़ सितारों को, मेरी मांग सजा दो,
अम्बर में लगे चाँद को, धरती पे ला दो,
ये चाँद सितारे, सजन गर दे नहीं पाओ
फूलो पे लदी तितलियों को, घर में तो ला दो 

फूलो पे लदी तितलियों को, घर में तो ला दो 


प्रेमी:-
मैं तोड़ सितारों को, तेरी मांग क्यों भरू?
अम्बर में लगे चाँद को, बर्बाद क्यों करू?
जब तू नहीं मेरी कहो क्यू तेरे प्यार में,
मासूम तितलियों का भला, खून क्यों करू?
मासूम तितलियों का भला, खून क्यों करू?


        कवि प्रभात "परवाना"
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शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

काश! काश! काश!......

जिस्म तपता रहा रात भर, हक़ीकत की आग से,
और करवटे,
मानो जगह बदल-बदल के
मुझे पूरी तरह सेंकना चाहती थी,

ये जिस्मानी तपन ना थी,
ना ही तन्हाई की तपन,
ये तपिश थी मेरी मजबूरी की, की काश मैं उसे बचा पाता.........


वो तितली जो उड़ना चाहती थी, अपने चटकीले आकर्षक परो से, रौंद दी गयी,
समाज के वहशी के हाथो.....
जो सिर्फ़ उसका कौमार्य पाना चाहता था,

फिर क्या था , एक बार उसके कठोर हाथ तितली के परो को लगे, और
और कठोर हो गये.

तितली का कौमार्य मिट चुका था और वो वहशी खुश था अपनी जीत पर,

तितली के पर उस वहशी के हाथो मे रह गये, और तितली ज़मीन पर असहाय ... पर
वो खुश था जो चाहिए था , मिल गया.....

अब तितली ज़िंदा थी, पुरानी यादो के सहारे उस पराग के सहारे,
जो उसने अभी-अभी पिया था.... तितली को लगा वो उठा लगे उसे, और घर ले चलेगा ,
पर वो चला गया उन तितलियो के पास, जो घर मे क़ैद थी, और सुंदर, और सुंदर......


पर मैं कहा था?????
मैं? मुझे तो बहुत देर से पता चला जब सब ख़त्म हो चुका था,
और मैं कर भी क्या सकता था निरीह बालक की तरह पत्ते से पलटता रहा , उस
तितली को, जो बिना परो के तड़प रही थी .....

अब उस तितली मे सिर्फ़ जिस्म था , जान तो वो ले जा चुका था
पर वो अभी मरी नही थी , ज़िंदा थी मगर लाश की तरह ..........

मैं एक निर्बोध बालक सा रोता रहा, कभी तितली पर, कभी वहशी पर, कभी हालात पर.....

हां वो आता है कभी कभी मुड़कर, उन परो को लेकर जो उसने कभी तोड़े थे, और
हर बार तितली सोचती,
वो उसे लेने आया है,

और इस बहाने कुरेद जाता वो पुराने जख्म, गुबार, तन्हाइया, खामोशिया और
बद-हवासियाँ.........

मैं उस बे-पर तितली को चाहने लगा, उसे ज़िंदा नही, जिंदगी देना चाहता था,

धीरे धीरे उस तितली को मुझसे प्यार हो गया, अब वो कटे पंख से फड़फड़ाने
लगी.... मगर वो डरती थी उड़ने से,
कही वो वहशी फिर.................-.........


यही ज़िंदगी है,
इंसान किस हद तक गिर जाता है, वादा पाने से दफ़नाने का,
और साथ बस पाने से पाने भर तक का.....

अब ज़िंदगी मे हसरते ना रही. बस काश! बचा था ,
काश! खुदा एक मौका और देता, ज़िंदगी के पन्ने पलटने का, एक मौका, ज़िंदगी
दुबारा जीने का

काश! एक मौका, उस भूल को सुधारने का, जो बद-हवासीयो मे होती चली गयी...........

काश! काश! काश!


        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 23 जनवरी 2013

बहाना बता दो...


परियो  सा हुस्न, जागीर में नहीं मिलता 
कहा से पाया है, ये खजाना बता दो ....

ये कमाल के हुनर, ज़रा हम भी सीख ले,
इश्क की नज़र से, दिल जलाना बता दो.....

धरती शितीज या आसमां , हम आ जाएंगे
तुम जहा कही भी हो, ठिकाना बता दो .....

कुछ काम पड़  गया, या मुश्किल में हूँ 
घर क्या कह के निकलू, बहाना बता दो।।।।


        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 1 जनवरी 2013

मान के चलिए ......


 वो बुरा करे, करने दीजिये, 
खुदा ही सजा देगा,  मान के चलिए .....

ख्वाब तोड़िए , ज़मीं पर उतरिये साहब ,
दोस्त ही दगा देगा, मान के चलिए ......

कौन है जो गुल में, खंजर रखता है,
वक़्त सब बता देगा, मान के चलिए ......

तेरे बलिदान उसे, बुलंदी पर ले गए बेशक,
वो सब भुला देगा, मान के चलिए ......

माँ बाप को ठोकरे खिला  रहा है जो अब तलक 
तुझे क्या सिला देगा, मान के चलिए ......

        कवि प्रभात "परवाना"
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रविवार, 2 दिसंबर 2012

अच्छा नहीं होता .......



ये शीशे के दिल है नज़ाकत से रखिये ,
कांच दरक जाए तो अच्छा नहीं होता .............

मंजिल पानी है बेशक मगर हद्दो में रहकर
जूनून हद्द से बढ़ जाए तो अच्छा नहीं होता .........


कहानी किस्से किताबो से हटकर सोचिये
चाँद ज़मीं पर उतर आये तो अच्छा नहीं होता .......

शौक से पीजिये मगर ख्याल रखिये
कदम लडखडाये तो अच्छा नहीं होता ................


        कवि प्रभात "परवाना"
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