मंगलवार, 18 मार्च 2014

आखिर चाहता क्या है?


यूँ ज़रा ज़रा करके, सताता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

तू खुदा मै नाखुदा, मान तो लिया मैंने
बाराह रुक रुक कर, जताता क्या है ?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

ग़मो की आंच पर, सुलगती है खुशियाँ
दुनिया की हांडी में, पकाता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

ज़िंदगी का बोझ अब, ढोया नहीं जाता
मेरी रोक दे साँसे, तेरा जाता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?


        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

आफ़ताब कौन देगा?


उसके दर पर नकाब, कौन देगा?
तेरे कर्मो का हिसाब, कौन देगा?
किसी पर सितम से पहले, सोच लेना
कल उस खुद को जवाब, कौन देगा?

आइना देखकर, इतराने वाले
ढलती उम्र में शबाब, कौन देगा?

ज़रा रौशनी में, ढूंढ लूँगा मंज़िल
इस जुगनू को आफ़ताब, कौन देगा?

आखिरी दहलीज पर बेटे, मुहँ मोड़ गए
अब उसकी चिता को आग, कौन देगा?

फिर एक दंगा चाहती है, सियासत
वरना दैरो-हरम में शराब, कौन देगा?


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 6 जनवरी 2014

हिम्मत कम नहीं होती.....



लाख कोशिश करू मैं, दिक्कत कम नहीं होती
उस खुदा की भी मुझपे रहमत, कम नहीं होती
छोटी उम्र में इतना, तजुर्बा तो कमाया है
दिल नेक हो तो घर में, बरक्कत कम नहीं होती

जुदाई महज इश्क का, इम्तेहान लगता है
फासला बढ़ता जाता है, मोहब्बत कम नहीं होती

समंदर में नदियों के जैसी, बढती जाती है
माँ के हाथ के खाने में लज्जत, कम नहीं होती

खुदा के इश्क में रांझे सा, हाल है मेरा
पत्थर खाता जाता हूँ, इबादत कम नहीं होती

मेरे हौसले की बस, इतनी सी कहानी है
परिंदा पर से घायल है, पर हिम्मत कम नहीं होती

        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

दोहरी ज़ुबान नहीं आती .……


लाख कोशिश करो, मुस्कान नहीं आती
चली जाए जिस्म से, फिर जान नहीं आती
ज़रा सी बात में, दिल निकाल कर रख दिया
सच, मुझे इंसान की, पहचान नहीं आती.……

बहेलिये मुझे मार, मगर उसे बक्श दे
परिंदा छोटा है, अभी उड़ान नहीं आती .……

तलवे चाट सकते तो, आगे बढ़ गए होते
कमी ये है, हमें दोहरी ज़ुबान नहीं आती .……

ज़िंदा का लहू, मुर्दे का कफ़न तक खा गयी
ये सियासी हवस, कभी लगाम नहीं आती.……



        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 4 नवंबर 2013

हम सरकार बदल देंगे........


तेल और तेल की धार, बदल देंगे,
ठान लिया तो संसार, बदल देंगे,
लूट, चोरी, सीनाजोरी बहुत हो चुकी अब तलक
वक़्त आ गया है, हम सरकार बदल देंगे ..........

शबनम को, आग लिखेंगे
इश्क़ को, इंकलाब लिख्नेगे
दिल में बैठा फनकार बदल देंगे
लूट चोरी , सीनाजोरी बहुत हो चुकी अब तलक
वक़्त आ गया है, हम सरकार बदल देंगे ..........


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 23 सितंबर 2013

भूल जाता है .....


जन्नत-ओं-जहानुम्म में अंतर, भूल जाता है,
नशे में इंसा, पीर पैगंबर भूल जाता है.…

बुलंदियों पर चढ़ते ही, कतरा आजकल,
मीलो गहरा है समंदर, भूल जाता है.…

ज़रा वाहवाही, क्या मिली ज़माने से,
मदारी के हाथो में है बन्दर, भूल जाता है.…

उम्र भर समेटता है, दौलत बेवजह
खाली हाथ गया था सिकंदर, भूल जाता है.…


        कवि प्रभात "परवाना"
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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

अश्क जो माँ बाप की आँखों में गए ...


बारिश में जैसे जलता दीया ऐसे  जला  हूँ,
हर वक़्त, हर हालात, कसौटी पे खरा हूँ,
ये आंधियाँ रोकेंगी क्या अब मेरा रास्ता 
बुजुर्गों की दुआओ को घर से लेके चला हूँ,

मिट्टी है कि तुम, पूरी दुनिया में छा गए,
तो क्या हुआ जो, हर किसी के दिल को भा गए 
धर्म, पुन्य, तीर्थ सारे व्यर्थ हो गए 
अश्क जो माँ बाप की,आँखों में गए 

        कवि प्रभात "परवाना"
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बुधवार, 28 अगस्त 2013

पूजा जिस जिस को मैंने......


पूजा जिस जिस को मैंने, परवरदिगार की तरह,
हर उस शख्स ने मुझे देखा, गुनेहगार की तरह 
दौलत भी क्या शय है, तब मालूम हुआ मुझको
जब अदालत गवाह सब बिक गए, अखबार की तरह......

रोज़ नए वादे करना, और रोज़ मुकर जाना
तुम भी पेश आ रहे हो, सरकार की तरह......

हर बार तुमसे उम्मीद, लगाता रहा ये दिल,
और तुम तोड़ती रही उम्मीद, हर बार की तरह......

तेरे ग़म की स्याही से, जब जब कुछ लिखा हमने
हर नज़र में आ गए हम, इश्तेहार की तरह .......

गुल-ओ-गुलशन से भर दिया, दामन मेरा एक पल
और फिर चले गए ठुकरा कर, किसी बहार की तरह ......



        कवि प्रभात "परवाना"
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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

कृष्ण तुम्हे अब आना होगा......


कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा …

कृष्ण तुम्हे अब आना होगा,कृष्ण तुम्हे अब आना होगा ......

त्राहि त्राहि सभी दिशाए
हमें बचाओ ,सब चिल्लाये
जल्लादों की भरमार पड़ी
गौ कटने को तैयार खड़ी .........

मीठी धुन की बंसी तज कर, तुमको शस्त्र उठाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा

कंसो सा आचार हो गया
पशुओ सा व्यवहार हो गया
देखो मानव नंगा होकर
बिकने को तैयार हो गया 
 .........

भगवन तुमको रन में आकर, गीता ज्ञान सुनाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा 

देखे औलादों के खेले,
मात-पिता को घर से ठेले
गुरुजन का सम्मान नहीं है,
भगवन की पहचान नहीं है
 .........

मोहन तुमको सौं जमुना की,सब पटरी पर लाना होगा
कृष्ण तुम्हे अब आना होगा, चक्र सुदर्शन लाना होगा


        कवि प्रभात "परवाना"
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सोमवार, 8 जुलाई 2013

एहसान लेना गवारा नहीं लगता.....


बच्चो के भूखे पेट को, पहचान लेता है,
पिता एक रोटी हिस्सों में, बाँट देता है,
माँ बीमार, चून ख़तम, लकडियाँ गीली,
आज फिर नहीं जलूँगा, चूल्हा भांप लेता है .....


एहसान लेना ज़मीर को, गवारा नहीं लगता
मुफलिस एक चादर में, सर्द राते काट लेता है .....

चुल्लू भर पानी में, वो शख्स, डूब मर जाए,
अपने काम की खातिर, जो तलवे चाट लेता है .....

बुरे वक़्त से कहाँ तक, बच सकोगे आप,
आदमी ऊंट पर बैठा हो, कुत्ता काट लेता है .....



        कवि प्रभात "परवाना"
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