कांटो को सजा बिछा कर, बिस्तर बना लिया
लो हमने भी शहर-ए-ग़म में, घर बना लिया
दरिया चिढ़ाता था जिन जिन, बूंदो को कभी
उन सब बूंदो ने मिलकर, समंदर बना लिया
सबके सब रखते हो ना, संगतराशी का हुनर
लो हमने भी इस दिल को, पत्थर बना लिया
बस तेरे दो आँसुओ से बाज़ी, हार गए वरना
हमने जिसे भी चाहा उसे, मुकद्दर बना लिया
खत-ए-दोस्ती का हर पन्ना, पढ़ लिया साहब
हमने दुश्मनो को अपना, रहबर बना लिया
बेटी नारायण सेवा है, बेटी पुण्यो का मेवा है
सावन भादो मॉस है बेटी, जीवन का आभास है बेटी
बेटी नभ का पता है, बेटी आशा है, लता है
बेटी वंदना है, पूजा है , बेटी दौड़ती उषा है
बिन बेटी ये दुनिया मौन है, बेटी में हीमैरी कॉम है
बेटी कुल का मान बढ़ाती, बेटी वायुयान उड़ाती
बेटी रामायण गीता है, बेटी में एक युग जीता है
त्याग तपस्या भाव है बेटी, एक मधुर सा राग है बेटी
बेटी वेदो की परिभाषा है , बेटी ही भाग्य विधाता है
बेटी झरनो सी पावन है, बेटी से ही अपनापन है
वीणा की झंकार है बेटी, आँगन का श्रृंगार है बेटी,
कंघन की खनखन है बेटी,बेटा चंदा, चन्दन बेटी
उपवन की तितली है बेटी, नदियों की मछली है बेटी,
बेटी सागर की गहराई है, बेटी अम्बर की ऊंचाई है,
मात पिता का बल है बेटी, जीवन में मंगल है बेटी
बेटी बेटे की राखी है, लंग़डेपन की बैसाखी है
भैयादूज का टीका बेटी, कड़वेपन में मीठा बेटी
बेटे हक़, हकदार है बेटी, नवरात्रों का त्यौहार है बेटी
बेटी दो दो घर की लाज है,ज़िम्मेदारी का आभास है
कहीं बेटी रिक्शा खींच रही है, पूरे कुल को सींच रही है
कही गर्भ में मरती बेटी, जग में आकर मरती बेटी,
इस पल से ही भूल सुधारो, बेटी को ना गर्भ में मारो,
बेटी में एक अंश पलेगा, बेटी से ही वंश चलेगा
बेटी में एक अंश पलेगा, बेटी से ही वंश चलेगा
दोस्ती करके दोस्त को, परखना नहीं आया
ठोकर खाके भी नादाँ को, चलना नहीं आया
महज इस बात पर गिरगिट ने, खुदखुशी कर ली
उसे इंसा की तरह रंग, बदलना नहीं आया.....
लहुलुहान परिंदा मंजिल पे, पहुच कर बोला
शिकारी नया था, पंख कतरना नहीं आया.....
राख समेटता चला गया, ख़त बनते चले गये
तुम्हारे खतो को ठीक से, जलना नहीं आया.....
गुलिस्तां में फिर उसके, पर ही पर मिले
जिस भी तितली को फूल पे, संभलना नहीं आया.....
बुलंदियां मुझे इसलिए भी, हासिल ना हुई
मुझे जमीर का कहा फैसला, बदलना नही आया.....
जाने सजदे में, क्या क्या ढूंढता रहा
इस ज़माने में इंसा, वफ़ा ढूंढता रहा
यहाँ जर्रा जर्रा, किसी सदमे में हैं
और मै शहर में रहनुमा, ढूंढता रहा .....
सुलग सुलग कर शहर, राख हो गया
एक पागल आसमां में, धुँआ ढूंढता रहा .....
बाती अँधेरे में, सिसकियाँ भरती रही
एक चिराग रात भर, हवा ढूंढता रहा .....
इश्क लाइलाज है, सभी जानते हैं मगर
हर हकीम इस मर्ज की, दवा ढूंढता रहा.....
बच्चे, फ़कीर, माँ पर, नज़र नहीं गयी
और इंसा मस्जिद में, खुदा ढूंढता रहा.....
इस दस्तक पर, मेहमां भी हो सकता है
हर बार ही हवा हो, जरूरी तो नहीं.....
कसूर हालात का भी, हो सकता है
हर शख्स बेवफा हो, जरूरी तो नहीं.....
मेरे हमदर्दो में ही, बैठा है कातिल
हर लब पे दुआ हो, जरूरी तो नहीं.....
लाश पे जख्म-ए-मोहब्बत, है साहब
मेरा क़त्ल ही हुआ हो, जरूरी तो नहीं.....
उसका एक एक सितम, लाइलाज निकला
हर जख्म की दवा हो, जरूरी तो नहीं.....
माँ की आँखे भी पढ़ कर, देखिये जनाब
मस्जिद में ही ख़ुदा हो, जरूरी तो नहीं.....
उनको ग़म के आंसू, पीना आता है
हमको भीगी आँखे, पढ़ना आता है
खंजर खाके, इस महफ़िल तक आये है
हमको हालातो से, लड़ना आता है.....
ऐ पत्थर दिल, तेरी कड़वी यादो से
हमको मीठी ग़ज़लें, गढ़ना आता है.....
पढ़ ले तो तेरी आँखे, भी रो देंगीं
हमको ख़त में आँसू, भरना आता है.....
बस इतना ही सीखा है, इस दुनिया में
वादे की खातिर जीना, मरना आता है.....
कह देते हो सारी बाते, आंखो से
तुमको भी क्या खूब, करीना आता है.....
चादर तकिये मे कई, समंदर रखते हैं
दिलवालो को क्या क्या, करना आता है.....
दुश्मनों ने भी ताउम्र, दुश्मनी नहीं छोड़ी
हम मौत से लड़े पर, ज़िंदगी नहीं छोड़ी
खुद को जला कर तब, रोशन किया मकां
जब अंधेरो ने मेरे घर मे, रौशनी नहीं छोड़ीं.....
जाम इस तरह पीया, कि तोबा नही टुटे
साहब नशे भी हमने, खुद्दारी नही छोड़ीं.....
अपने कातिल को खुद, खंज़र दे दिया
चकाचौंध मे भी हमने, सादगी नही छोड़ी.....
एक नकाब हटा कर, दूसरा लगा लिया
सियासत ने आवाम से, गद्दारी नहीं छोड़ी.....
मस्जिद नहीं गया, माँ का सजदा कर लिया
जिस तरह भी की, हमने बंदगी नही छोड़ीं.....
हम क्या थे और हमे, क्या बना दिया
उसकी महर ने हमे, बंदा बना दिया
मुफ़लिस बच्चे ने पूछा, रोटी क्या शय है
मैंने कलम उठायी और, चंदा बना दिया
अँधेरे हर पल मुझे, रास्ता दिखाते रहे
इस चकाचौंध ने मुझे, अंधा बना दिया
एक ज़माना था, इबादत-ए-शायरी का
कुछ खुदगर्जों ने इसे, धंधा बना दिया
मौत को रंगीनिया अता की, इस तरह
मैंने कफ़न रंग दिया, तिरंगा बना दिया।
बिंदिया, पाजेब, कुमकुम खरीद लाया
सच्ची ख़ुशी खरीद के ला, तो मानू .....
बदन खरीद लाया, हवस मिटाने को
दिलकशी खरीद के ला, तो मानू .....
दो चार मैकदों से, मेरा क्या होगा?
बेखुदी खरीद के ला, तो मानू .....
चाँद पर ज़मीं खरीद बैठा, पागल
चाँदनी खरीद के ला, तो मानू.....
पैसा पैसा पैसा पैसा, अरे गुरूरबाज़
ज़रा ज़िंदगी खरीद के ला, तो मानू.....
ये किसने भेजा है पैगाम, मत पूछिये
किसका ख़त है मेरे नाम, मत पूछिये
मोहब्बते बाँटने घर से, जब जब चला
मुझपे लग गया इल्जाम, मत पूछिये.....
मेरा सच ठोकर पर, ठोकरें खाता रहा
झूठ को ही मिला इनाम, मत पूछिये.....
चंद दिनों में वो, अमीर-ए-शहर हो गया
बन्दा क्या करता है काम, मत पूछिये.....
सूली चढ़ा दिया ना, शहर के बींचो बीच
नादान हौसले का अंजाम, मत पूछिये.....
लो अपनों को एक एक, राज बता बैठा
मैं भी हो ही गया बदनाम, मत पूछिये.....
अब इबादत पर भी, सयासी हक़ हो गया
सजदा भी कर दिया हराम, मत पूछिये.....