गुरुवार, 4 अगस्त 2011

कागजी कस्ती....

आज कलम फिर बरसी है बादलो की तरह,
पढने वाले पढ़ रहे है पागलो की तरह,
मै तैयार हू मिट  जाने को परवाना बनकर,
और वो तैयार है दीपक में लौ की तरह....

मिले थे कई गैर, मैं मिल लिया गले,
और फिर बिछड गए वो रास्तो की तरह

विश्वास तोडा दुनिया मगर हम भी है सनम
हिफाजत में तेरे घर के जालो की तरह

फूल दे रहे हो मंशा साफ़ कह देना
चुभ ना जाना शूल बन कहीं भालो की तरह

धुआ जो उठ रहा है ये आसमान में,
जल रहा है दिल मेरा एक बस्ती की तरह

समंदर की सैर पर निकल दिया"प्रभात"
फर्क क्या कहे कोई कागजी कस्ती की तरह 

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"




1 टिप्पणी:

Er. Diwas Dinesh Gaur ने कहा…

प्रभात भाई बेहद शानदार कविता."कागज़ी कश्ती"

आपमें एक जूनून है, अत: विनती करता हूँ की कृपया कभी निराश न हों, विचलित न हों|
आपका व मेरा लक्ष्य एक ही है व मार्ग भी|
आप हम साथ चलें, साध्य अवश्य मिलेगा|

आप कारवां बढाते चलिए, हम भी साथ हैं|
साधुवाद...