रविवार, 12 जून 2011

क्या दूढ़ते हो किनारों में ......

मेरी दुआ तेरे साथ रहेगी बेवफा , आजमा लेना
मेरी सांस अलग हो सकती है पर तेरी याद नहीं .......

तेरा काम है बस ग़म देना बेवफा,
पर बहुत है अभी मुझे रुमाल देने के लिए ..
आज मेरे दोस्तों ने दी है इतनी खुशी,
तेरे पास कम हो तो आजा लेने के लिए

मेरा पैर बढ़ा ही था चलने के लिए,
सूरज हिला ही था ढलने के लिए,
उनका काजल आज ख़तम हुआ है यारो
मै तो कब से तैयार था जलने के लिए
मै तो कब से तैयार था जलने के लिए 

मै जी रहा हूँ या मर गया हूँ
किसी कीमत पर, उस तक ये बात ना जाए
शौक से दफना दो मुझे जिंदा यारो,
पर ऐसी जगह, जहा उसकी याद ना आये.. .....
पर ऐसी जगह, जहा उसकी याद ना आये.. ..

लूट लो मुझे आज जी भरकर ,निकला हूँ बाजारों में,
कस्ती समंदर की तलहट में, क्या दूढ़ते हो किनारों में
मै डूबा ,तूफ़ान उठा है , अंदर का इंसान हिला है
कोई मरा है परदेसी ये हलचल है मछवारो में
कोई मरा है परदेसी ये हलचल है मछवारो में .....

इस कदर गम के साये में डूबी है जिंदगी की हँसता भी हूँ तो आसू
छलक जाते है ---


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना" 


1 टिप्पणी:

SARITA ने कहा…

wah , kya baat hai.