शनिवार, 18 जून 2011

हुस्न बेकार है दीवानों के बिना......

हुस्न को कौन पूछे गर दीवाने ना हो,
साखी को कौन पूछे गर मैखाने ना हो,
शमा खुद झुक झुक के कबूल करती है देखो
उसे कौन पूछे गर परवाने ना हो

आसमां कम है क्या जीने के लिए बोलो
परिंदे क्यों आये ज़मीं पर, गर दाने ना हो

बेहिसाब पी के कही गिर ना जाए हम
डर तो लगता है ना जब पैमाने ना हो 

मन भी करता है और मौके भी है दोस्तों पर 
पर क्या करे परो का जब उड़ाने ना हो 

बाहर ठण्ड में क्यों खड़े है आप?
आजाओ मेरे घर में गर ठिकाने ना हो 
शमा खुद झुक झुक के कबूल करती है देखो
उसे कौन पूछे गर परवाने ना हो
उसे कौन पूछे गर परवाने ना हो

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"



5 टिप्‍पणियां:

Manish Kr. Khedawat ने कहा…

bahut khoobsurat rachna parwana zi
_________________________________
राजनेता - एक परिभाषा अंतस से (^_^)

ajay ने कहा…

sundarta ki taarif nahi karna ye bhi gunah hai.isliye shama k bina parvana adura hai vaise hi husn k bina..............sundarta.

एस.एस.अविन ने कहा…

बहुत खूब क्या खूब कहा है! वाह वाह!

abhishek singh ने कहा…

good

SARITA ने कहा…

sagar tak jo pahuch sake wo nadia ki dhaara hai, jamin ko jo bhigo sake o diwani sawan hai,,; ,,,,jeevan ka jo parwa na kare o machalta bhawraa hai, thak kar sakhi rakhe jahan kadam wohin khulti mekhana hai.

lovely poem