गुरुवार, 30 जून 2011

मुझे जलाने को आग लायी है वो...

खुश होकर सौगात लायी है वो
अपनी आदत से बाज ना आई है वो,
खबर दी किसी ने उसे परवाना हूँ मै,
मुझे जलाने को आग लायी है वो...

कोई दिखा दे उसे "प्रभात-इ-नूर जी
मुझे डराने को आफताब लायी है वो..

कब्र पर आने का वादा तोड़ ना सकी..
पर गैर कोई ख़ास साथ लायी है वो

नाम क्या क्या रख दिए मैंने भी शौक में
गम, दर्द ,तन्हाई और बेवफाई है वो..

मर गया मै उस दिन जब पता ये चला
मातम में बजती शहनाई है वो..

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


4 टिप्‍पणियां:

Rahul Yadav ने कहा…

bahut khoob prabhat Ji__ mohabbat ek meetha zeher __ anjaam pta hote hue bhi sab isse chakhte hain

Pawan Rekha ने कहा…

प्रभात जी.
वाकई बहुत अच्छा लिखते है आप. 'मुझे जलाने को आग लाई है वो..' मुझे बहुत अच्छी लगी. हमारी शुभकामनाए आपके साथ है. आप हमेशा ही लिखते रहे.

sanjay pareek ने कहा…

yek tees si dil me uthti h,,,,yek dard jigar me hota h...jub sara aalam sota h...vo chupke chupke chupke rota h

SARITA ने कहा…

KHABAR DI KISINE PARWANA HUN MEIN, MUJHE JALANE KELIE AAG LAITHI O" beautiful line.. each line shows your excellency in supernatural thoughts. lovely ..