सोमवार, 9 मई 2011

देखता ही तो हूँ ....


वो पी रहा है,
वो जी रहा है
कड़क धूप, उड़ती धूल नीम का पेड़
उसके नीचे कपडे सी रहा है


आँखों के कंचे हर वर्ग पर फेरता हूँ,
रह के बंद अँधेरी कोठरी में कलम की आँख से सब देखता हूँ


गर्म गर्म चपाती कविता की सेकता ही तो हूँ,
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ 


निर्धन की बेटी की शादी,
कही से पूरी कही से आंधी,
दो पूड़ी दो सब्जी सजती,
उसपर भी आ जाती आंधी,


उस निर्धन के अश्को-मोती  समेटता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ 


गरीबो के अमीरी चोचले
संगमरमर के देखो घोसले 
झूठी शान दिखने को ये 
करते है नए नए ढकोसले  


दो टूक कहो या व्यंग कहो फेकता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ 


वो चलता है कारों में,
रात बिताता बारो में,
नोटों को हड्डी जहा फेकता 
आ जाता सरकारों में


ऐसी गन्दी गलिया प्यारे, छेकता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ 
 देखता ही तो हूँ  देखता ही तो हूँ 


प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"


3 टिप्‍पणियां:

सहज साहित्य ने कहा…

भाई साहब किसी ने लगता है आपको डॉ जेन्नी शबनम के हाइकु भेजे हैं पर वह पेज नज़र नहीं आ रहा है ।ये हिन्दी हाइकु पर छप चुके हैं ।कहीं किसी चोर कवि ने दूसरे नाम से तो नहीं भेज दिए होंगे । आप उनका नाम बताने की मेहरबानी करेंगे ।चुराकर बोली में बदले हाइकु ये हैं जो आपके ब्लाग पर अब नज़र नहीं आ रहे हैं- -तौल सके जोनहीं कोई तराजूमाँ की ममता!2. समझ आईजब खुद ने पाईमाँ की वेदना!3. माँ का दुलारनहीं है कोई मोलहै अनमोल!4. असहाय माँकह न पाई व्यथाकोख़ उजड़ी!5.
आपका
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
rdkamboj@gmail.com

सहज साहित्य ने कहा…

भाई प्रभात जी ये कमेण्ट आपके लिए नहीं यह उस लेखक के लिए है जिसने डॉ जेन्नी शबनम के हाइकु इस ब्लाग पर भेजे थे । मुझे सम्पादक जी का ई मेल नहीं मिल सका था । आपके लिए होता तो मैं नाम न पूछता ।गूगल से पता चला था इन हाइकुओं का । आपकी कविता बहुत हृदय स्पर्शी है । यह हाइकु है ही नहीं। आपका इस कमेण्ट से कोई सम्बन्ध नही है । यदि आपको इससे कष्ट पहुँचा हो तो क्षमा कीजिएगा ।मैंने टिप्पणी में केवल हाइकु का जिक्र किया है ।

आपका
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

ritesh kumar tikariha ने कहा…

well blog
thanx
but plz also my blog durgwala
http://rktikariha.blogspot.com/
thanx again