गुरुवार, 24 मार्च 2011

दर्द भरे नगमे


दर्द भरा हो सीने में,
मजा न आये जीने में, 
चल साखी मैखाने में,
देख मजा फिर पीने में,

जुल्फों को हिला कर मुझे तक हिला देती है,
पास जाके कब्र के मुर्दों को जिला देती है,
मै नहीं पीता हुजूर शौक से  पैमाने को,
वो जालिम इतनी है की नजरो से पिला देती है 

हम घबरा रहे थे उनकी पायल की झंकार से,
वो दिल को मेरे चीर रही थी अपने नैनो की धार से,
यु तो दुनिया ने जोर लगाया जान हमारी लेने को,
पर उन्होंने हमको मार दिया जुल्फों की बौछार  से 

क्या बहार आएगी इस सूने चौबारे में,
क्या चमक आएगी इस बुझते हुए तारे में,
जब पुछा उन्होंने कुछ ऐसा तो बस ये निकला,
कभी पूछा  नहीं मैंने दिल से इस बारे में,

जब पूछा दुनिया ने उस रात कहा थे,
कैसे कह देता हम वह थे,
कुछ बोल न सके वो होठो से हाल-ए-मॉहौल देखिए
उनकी आँखों की शर्म वह थी और हम चुप यहाँ थे, 

प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"

1 टिप्पणी:

PRAKASH S AHUJA ने कहा…

PINE KI BAAD JAB MAIN NAHI HILTA , TAB WHO JALIM MERA GLLLAS HILA DETI HAI